खिलाड़ी डरें, उतावलापन भारी पड़ सकता है!

राजेंद्र सजवान,
सरकार ने लॉकडाउन-4 में भले ही खिलाड़ियों को स्पोर्ट्स कॉंप्लेक्स और स्टेडियम में लौटने की इजाज़त दे दी है लेकिन खेल मंत्रालय फूँक फूँक कर कदम रखने की सलाह दे रहा है| खेल मंत्री किरण रिजिजू ने बाक़ायद अपने विभाग के तमाम अधिकारियों और कोच खिलाड़ियों को निर्देश दिए हैं कि खेल शुरू करने की हड़बड़ी में ऐसा कुछ ना करें जिससे कोरोना और अधिक आक्रमकता ना दिखने लगे| बेशक, लंबे समय से खेलने के लिए तरस रहे खिलाड़ी अपने अपने खेल को पटरी पर उतारना चाहते हैं| ख़ासकर, वह खिलाड़ी जोकि ओलंपिक का टिकट पा चुके हैं या ओलंपिक क्वालीफायर में भाग लेने की प्रतीक्षा कर रहे हैं कुछ ज़्यादा ही उतावले हैं| हालाँकि ओलंपिक के लिए अभी काफ़ी समय बचा है परंतु निश्चित कुछ भी नहीं है|


 यह सही है कि लॉकडाउन के चलते देश और दुनियाभर के खिलाड़ियों की तैयारी प्रभावित हुई है और कुछ एक देशों के खिलाड़ी इस सोच के साथ खेल मैदानों की तरफ लौट रहे हैं कि उन्हें और पूरी दुनिया को कोविड 19 के साथ जीना और खेलना पड़ेगा| फिरभी खिलाड़ियों को पूरी सावधानी के साथ खेलने की सलाह दी जा रही है, ताकि कोई चूक ना हो और यदि हुआ तो ज़रा सी चूक सारा खेल बिगाड़ सकती है| खेल मंत्रालय के अनुसार सभी कोच, खिलाड़ी और सपोर्ट स्टाफ सोशल डिस्टेनसिंग का पालन करेंगे| और दर्शक तो बिल्कुल भी नहीं होंगे| अर्थात यह अपनी तरह का नया अनुभव होगा|


 देश के खेल मंत्रालय नें कुछ खेलों को नियमों का पालन करने की शर्त पर अपनी गतिविधियाँ शुरूकरने की अनुमति दे दी है| साथ ही यह भी स्पष्ट रूप से कह दिया गया है कि खेलों के सुचारू आयोजन या अभ्यास का पूरा जिम्मा राष्ट्रीय और राज्य खेल इकाइयों पर होगा और कहीं कोई चूक हुई या नियम तोड़े गये तो ज़िम्मेदारी संबंधित फ़ेडेरेशन की होगी| मंत्रालय और खेल फ़ेडरेशन मानते हैं कि बॉडी कांटेक्ट वाले खेलों में खेलना संभव नहीं हो पाएगा| मसलन, कुश्ती, मुक्केबाज़ी, हॉकी, फुटबाल, वॉलीबाल, बास्केटबाल जैसे खेल और जिम एवम् तैराकी पूल का उपयोग फिलहाल वर्जित किया गया है| जिम उपकरणों और तैराकी पूल के पानी से संक्रमण का ख़तरा सबसे ज़्यादा माना जा रहा है| हालाँकि खिलाड़ी धीरे धीरे और बहुत कम संख्या में बाहर निकल रहे हैं लेकिन ज़्यादातर डरे सहमें हैं| उन्हें डरना भी चाहिए| ज़्यादा उतावलापन भारी भी पड़ सकता है| 

घायल पिता को साइकल पर बैठा कर 1200 किलोमीटर चली 15 वर्षीय ज्योति

राजेंद्र सजवान
कोरोना नें जहाँ एक ओर देश की सरकारों के चेहरे से झूठ और निरंकुशता का नकाब हटाया है तो तमाम अमानवीयता और निर्लजता के चलते कुछ मानवीय पहलू भी उभर कर सामने आए हैं| भले ही देश का मजदूर बदहवास है| उसे हर तरफ असुरक्षा और मौत का तांडव नज़र आ रहा है| वह अपने गाँव की तरफ बढ़ निकला है, यह कहते हुए कि दिल्ली और अन्य शहरों में भूख से मरने की बजाय अपने गाँव, अपने घर में मरना ठीक समझते हैं| गुड़गाँव से दरभंगा साइकल से पहुँचने वाली ज्योति कुमारी की कहानी मजदूरों की विवशता और उनके साहस का परिचय देती है|

ज्योति गुड़गाँव में अपने घायल पिता की मदद करने गाँव से आई थी| लेकिन लॉकडाउन ने उनकी चिंता बढ़ा दी एक तो पापा दुर्घटना के बाद पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुए| उपर से कोरोना की गाज गिरी| काम धंधा सब बंद हो गया| मुश्किलें लगातार बढ़ती चली गईं तो आठ मई को ज्योति ने एक साहसिक फ़ैसला लिया और अपने पिता से बोली कि वह अपनी साइकल पर पीछे बैठा कर पिता को गाँव ले जाएगी| 15 वर्षीय ज्योति की बात सुनकर पहले तो पिता हंस दिए लेकिन अगले दिन सुबह जब उसने पिता से सामान बाँधने के लिए कहा तो वह दंग रह गए|

पिता ने बहुत समझाया और कहा कि 1200 किलोमीटर साइकल चलाना और बीमार एवम् भारी वजनी आदमी को बैठा कर ले जाना जोखिम भरा होगा| खैर, बेटी जब नहीं मानी तो पिता तैयार हो गये और ज्योति ने 12 दिन साइकल चलाकर वह कर दिखाया जिसे लेकर उसके पिता डरे हुए थे| वह सुबह आठ से चार बजे तक साइकल चलाती थी| दोनों पिता बेटी फिलहाल क्वारेंटाइन में हैं लेकिन ज्योति की बहादुरी की कहानी सुर्खियाँ चुरा रही है| उसे झाँसी की रानी, कल्पना चावला और कोरोना योद्धा जैसे संबोधनों से सम्मानित किया जा रहा है|

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