कुश्ती की डगर सबसे मुश्किल : महासिंह राव

राजेंद्र सजवान
कोरोना और जीवन को अब एक साथ चलना होगा और खेलों को यदि पटरी पर लाना है तो बचाव के समुचित उपाय करने होंगे| सरकारें, खेल जानकार, वैज्ञानिक, डाक्टर, कोच और खिलाड़ी सभी का ऐसा मानना है और सभी खेलों के भविष्य और बचाव के उपायों पर चिंतन मंथन में जुट गए हैं| हालाँकि स्टेडियम और खेल कॉम्पलेक्स खुल गये हैं और कुछ खेलों में खिलाड़ियों ने अभ्यास शुरू कर दिया है लेकिन भारत का शुद्ध भारतीय खेल कुश्ती असमंजस की स्थिति में है|

कारण, कुश्ती में सोशल डिस्टेनसिंग का पालन करें तो कैसे| इस बारे में द्रोणाचार्य अवॉर्ड से सम्मानित और गुरु हनुमान अखाड़े के कोच महासिंह राव से जब भविष्य की संभावनाओं के बारे में पूछा गया तो गहरी सोच के बाद बोले, “कुछ भी समझ नहीं आ रहा| शुरुआत करें तो कहाँ से और कैसे”|


महासिंह के अनुसार कुश्ती जैसे खेल में दूरी बनाने का सवाल ही पैदा नहीं होता| जब दो पहलवान लड़ते हैं तो उनके हाथ पाँव ही नहीं पूरा जिश्म और यहाँ तक कि साँसें भी आपस में टकराती हैं| बॉडी कांटेक्ट वाले खेलों में कुश्ती की स्थिति ख़ासी जटिल है और तमाम जटिलताओं से निपटने के लिए हट कर प्रयास करने होंगे| उनके अनुसार अपने जीवन काल में उन्होने कभी भी इस प्रकार की कठिन स्थिति को शायद ही कभी देखा हो|

उन्हें नहीं लगता कि कुश्ती अगले कई सालों तक सामान्य खेल के रूप में बनी रह पाएगी| प्रतिस्पर्धा तो दूर की बात है, अभ्यास करना भी आसान नहीं रह गया है| जिस मैट और अखाड़े में पहलवान अभ्यास करेंगे उसे पूरी तरह सेनेटाइज करने की ज़रूरत पड़ेगी| साथ ही जितने भी पहलवान मैट पर उतरेंगे उन सबका टेस्ट ज़रूरी होगा| यदि एक भी बीमार निकला तो सभी पर उंगलियाँ उठ सकती हैं|


महासिंह को नहीं लगता कि पाँच-छह महीने से पहले कुश्ती अपने स्वाभाविक रूप-स्वरूप में लौट पाएगी| गुरु हनुमान अखाड़े में उन्होने कई नामी पहलवानों को प्रशिक्षण दिया| साई कोच के रूप में गुरु हनुमान के करीबी रहे लेकिन उन्हें नहीं लगता कि किसी गुरु खलीफा या एक्सपर्ट के पास कोई हल है| महासिंह कहते है कि इस बारे में अंतरराष्ट्रीय कुश्ती यूनियन और भारतीय कुश्ती फ़ेडेरेशन के दिशा निर्देशों के बाद ही कोई कदम बढ़ाया जा सकता है| लेकिन अन्य खेलों की तुलना में कुश्ती की डगर कोरोना ने बड़ी मुश्किल कर दी है|


उनके अनुसार यह अकेले भारतीय पहलवानों की चिंता नहीं है। पूरी दुनिया के महिला और पुरुष पहलवानों को फिलहाल कोई उपाय नहीं सूझ रहा लेकिन जल्दी ही कुछ न कुछ हल जरूर निकल जायेगा। उन्हें इस बात की भी चिंता है कि पिछले कुछ ओलंपिक खेलों से कुश्ती में पदक मिलते आये हैं।

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