चैम्पियन बॉडीबिल्डर अब उत्तराखंड में खेलों को बढ़ावा देगा!

राजेंद्र सजवान
कुछ इंसान या खिलाड़ी ऐसे होते हैं जोकि हमेशा हमेशा के लिए आपके दिल दिमाग़ में रच बस जाते हैं| फिर चाहे वह प्रदर्शन, उपलब्धि या आचरण से आपको पसंद आते हों या अन्य किसी गुण के चलते| दर्ज़नों हैं जिन्हें आप हमेशा याद रखना चाहते हैं| जहाँ तक मेरे प्रिय खिलाड़ियों की बात है तो उनमे बॉडी बिल्डर दिनेश असवाल का नाम पहली कतार में आता है|

यह सही है कि दिनेश मेरे पैतृक जिले टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड से है, जिस कारण से उसके प्रति आत्मीयता बढ़ जाती है लेकिन उसके चाहने वाले हज़ारों, लाखों में हैं| सिर्फ़ इसलिए नहीं क्योकि वह एक खूबसूरत शरीर का मालिक है अपितु इसलिए भी क्योंकि वह दर्शनीय देह में शानदार दिल भी रखता है|

जहाँ तक मुझे याद है बीसवीं सदी के आख़िरी सालों में दिनेश से मुलाकात हुई| तब दिल्ली में बॉडी बिल्डिंग के खूब मेले लगते थे और पहली ही झलक में वह मुझे इसलिए भा गया था क्योंकि दिल्ली और देश के श्रेष्ठ बॉडी बिल्डर में शुमार होने के बावजूद वह हमेशा शांत, विनम्र और हंसमुख नज़र आया| जब वह मिस्टर दिल्ली बना तो पहले की तरह शांत चित रहा, मिस्टर रेलवे और मिस्टर इंडिया जैसे खिताब पाने के बाद भी उसमें कोई बदलाव दिखाई नहीं पड़ा| तब मेरे कुछ पत्रकार मित्रों ने उलाहना दिया, कोई अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड जीतने दो, लड़के को पंख लग जाएँगे|

लेकिन वह हर किसी को ग़लत साबित करता चला गया| 2000 और अगले छह सालों में उसे देश का बेस्ट पोजर, बेस्ट बॉडी बिल्डर, मोस्ट मसकुलर मैन आँका गया| कामनवेल्थ चैंपियनशिप, साउथ एशियन चैंपियनशिप, एशियन चैंपियनशिप और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में स्वर्ण पदक और मिस्टर यूनिवर्स में आठवाँ स्थान पाना उसकी उपलब्धियाँ रहीं, जिन पर किसी भी खिलाड़ी को गर्व हो सकता है और कभी ना कभी अकड़न आ जाती है| लेकिन दिनेश में कभी कोई बदलाव नज़र नहीं आया क्योंकि उसकी परवरिश सीधे सच्चे गढ़वाली परिवार और परिवेश में हुई|

मैं खुद को इसलिए सौभाग्यशाली समझता हूँ कि 1999 में उसे श्रेष्ठ खिलाड़ी और 2000 में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली अवॉर्ड प्रदान करने वाले उत्तरांचल स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट एसोसिएशन की अध्यक्षता मेरे हाथों में थी| दिल्ली सरकार और गुरु हनुमान ट्रस्ट ने भी उसे श्रेष्ठ खिलाड़ी का सम्मान दिया| फिलहाल दिनेश असवाल दिल्ली और देश की बॉडीबिल्डिंग इकाई के प्रमुख हैं और उस खेल को बहुत कुछ लौटाना चाहते हैं जिसने उसे पहचान दी है| लेकिन उसे इस बात का अफ़सोस है कि देश में उसका खेल अवसरवाद का शिकार है और ग़लत लोगों के हाथों खेल रहा है|


पिछले कुछ सालों में उसने उत्तराखंड में खेलों को बढ़ावा देने का बीड़ा उठाया है| ‘दिनेश असवाल स्पोर्ट्स एंड कल्चरल सोसाइटी’ नामक एनजीओ का गठन कर वह अपने प्रदेश में मुक्केबाज़ी, फुटबाल,बॉडी बिल्डिंग, पावरलिफ्टिंग और अन्य खेलों को बढ़ावा देना चाहता है| उसके अनुसार सरकार और स्थानीय सहयोग से वह पहाड़ों में खेलों का माहौल बनाने के लिए दृढ़ संकल्प हैं|

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