ज्योति में है दम: परीक्षा नहीं प्रोत्साहन की हकदार है!

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राजेंद्र सजवान – ऑथर
रविंदर सिंह बिष्ट – क्रिएटर

एनडीटीवी की खबर के हवाले से “क्लीन बोल्ड” ने 20 मई को 15 साल की ज्योति कुमारी द्वारा गुड़गाँव से बाराबंकी तक साइकल चलाने की खबर प्रकाशित की थी| अपने बीमार पिता को पीछे बैठा कर ज्योति ने 1200 किलोमीटर की दूरी तय की और अब वही ज्योति ना सिर्फ़ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय खबर बन गई है और हो सकता है कि जल्दी ही उसे कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिल जाए, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बेटी ने ज्योति के जज़्बे को सलाम किया और बाक़ायदा उसे बधाई दी है| बिहार के सिरहूली गाँव की ज्योति ने अपने ज़ख्मी पिता को साथ लेकर रोज सौ से डेढ़ सौ किलोमीटर साइकल चलाई और आठ दिन में गाँव का सफ़र तय किया|

कोरोना के चलते जहाँ एक ओर लाखों मजदूर बीमारी और भुखमरी के शिकार हुए, कई एक ने जानें गँवाई तो कुछ एक कहानियाँ इंसानी हिम्मत और कुछ भी कर गुजरने का प्रमाण बनीं| ज्योति की कहानी भी कुछ इसी तरह की है जिस पर अब भारतीय साइकलिंग फ़ेडेरेशन मुहर लगाना चाहती है| फ़ेडेरेशन के अध्यक्ष ओंकार सिंह ने बाक़ायदा घोषणा कर दी है कि अगले माह जून में ज्योति को दिल्ली बुलाया जाएगा जहाँ उसका ट्रायल होगा और यदि खरी उतरी तो उसे राष्ट्रीय कैंप मे शामिल किया जाएगा|

बेशक साइकलिंग फ़ेडेरेशन का कदम सराहनीय है| आम तौर पर पँचर साइकल पर सफ़र करने वाली फ़ेडेरेशन ने मौके पर चौका मारा है| ज्योति को निमंत्रण भेज कर ओंकार जी और उनकी टीम ने दिखा दिया है कि उनकी फ़ेडेरेशन अब मैच्‍योर हो गई है| लेकिन एक बात समझ नहीं आई कि ज्योति को किस तरह की परीक्षा से गुज़रना होगा! वह अपना अदम्य साहस, दमखम, हिम्मत और कठिन परिस्थियों में डटे रहने की ज़िद्द का परिचय दे चुकी है| जिस काम को अंजाम देने के बारे में आम मर्द सोच नहीं सकता उसे ज्योति ने कर दिखाया| एक आठवीं कक्षा की बिहारी लड़की को और कैसी परीक्षा देनी होगी! बेहतर होगा कि उसे सीधे कैंप में शामिल किया जाए| उसे सिखाया पढ़ाया जाए और सरकार उसके परिवार की गुजर बसर का खर्च उठाए तो देश को पदक विजेता मिल सकती है|

फ़ेडेरेशन के बड़े जानते ही हैं कि साइकल चलाना और प्रतिस्पर्धात्मक साइकलिंग में अंतर है| उसे एक- दो महीने तक स्पर्धा के अनुकूल ढलने का समय दिया जाए और तत्पश्चात परीक्षा ली जाए तो अच्छे परिणाम सामने आ सकते हैं| डर इस बात का भी है कि कहीं यह कहानी मैराथन दौड़ने वाले छोटी उम्र के धावक बुधिया जैसी होकर ना रह जाए| कुछ इसी तर्ज़ पर मध्य प्रदेश, कर्नाटक और अन्य राज्यों में भी उसैन बोल्ट निकल कर आए थे| खेल मंत्रालय और संबंधित राज्य खेल इकाइयों ने बिना सोचे समझे घोषणाएँ कीं और उपहास के पात्र बने| अर्थात ज्योति के मामले में हट कर सोचने की ज़रूरत है|

ज्योति की स्टोरी को पहले ही sajwansports पर प्रकाशित करदिया गया था पोस्ट का स्क्रीन शॉट आपके साथ शेयर कर रहा हु|

Jyoti-Screenshoot

One thought on “ज्योति में है दम: परीक्षा नहीं प्रोत्साहन की हकदार है!

  1. Kahan kahan se khabrein leke chapte ho. Muskil aur saccha. Khabar bhi aur samaaj ko bhi kuch accha kaam karne ke liye prernasotra bhi banter ho.
    Lage Raho SAJWANJI.

    Like

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