कराटे : अपनों ने लूटा कोरोना ने मारा!

राजेंद्र सजवान

रविन्द्र सिंह बिष्ट

कोविड 19 की मार से जीवन का कोई भी क्षेत्र अप्रभावी नहीं रहा है| बड़े-छोटे धंधे, फ़ैक्टरियाँ और कल कारखाने बंद पड़े हैं तो खेल उद्योग भी पूरी तरह बर्बाद हो चुका है| लाक डाउन के चलते खिलाड़ी अपने अपने घरों में क़ैद होकर रह गये हैं| कोरोना ने यूँ तो क्रिकेट, हॉकी, फुटबाल, मुक्केबाज़ी, कुश्ती जैसे लोकप्रिय खेलों की कमर तोड़ डाली है लेकिन भारतीय नज़रिए से मार्शल आर्ट्स खेलों को भारी नुकसान हुआ है|

ऐसा इसलिए क्योंकि जूडो, कराटे, तायकवांडो, वुशु जैसे खेल भारत में स्कूल कल्चर का हिस्सा रहे हैं और बड़े-छोटे महानगरों में इन खेलों की पकड़ अन्य के मुक़ाबले ख़ासी मजबूत रही है| ख़ासकर, कराटे और तायकवांडो ख़ासे लोकप्रिय खेल हैं और लाखों स्कूलों में इन खेलों का चलन बड़े पैमाने पर रहा है| लेकिन आज इन खेलों की बदहाली का आलम यह है कि हज़ारों मास्टर्स, कोच, ट्रेनर और खेल सामग्री बनाने वाले भूखों मरने की कगार पर पहुँच गए हैं|

दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलूरु, चेन्नई, लखनउ, देहरादून, नैनीताल, शिमला, जैसे शहरों और छोटे बड़े कस्बों में मार्शल आर्ट सिखाने पढ़ाने वाले रिक्शा चलाने, फल सब्जी और सेनेटाइजर बेचने के लिए विवश हैं| कुछ एक ऐसे भी हैं जिनके पास कमाई का कोई ज़रिया नहीं रहा और मजबूर होकर अपराध जगत के साथ जुड़ गये हैं| आख़िर हर एक को अपना और अपने परिवार का पेट भरना है|

इन खेलों में सबसे ज़्यादा असर कराटे पर पड़ा है।एक सर्वे के अनुसार देश में कराटे खिलाड़ी और सीखने वाले लगभग दो करोड़ हैं, जिनके मां बाप उन्हें बचपन में किसी कराटे कोच के हवाले कर देते हैं और इस उम्मीद के साथ लापरवाह हो जाते हैं कि उनका बच्चा अब पूरी तरह सुरक्षित है| लेकिन उन्हें क्या पता कि खुद उन्हें सिखाने वाला आज किस कदर असुरक्षित महसूस कर रहा है|

एक अनुमान के अनुसार कराटेअपने आप में एक बड़ी भारतीय उद्योग है, जिसमें हर साल कई हज़ार करोड़ का कारोबार होता है, जिसमें खिलाड़ियों की मासिक फीस, बेल्ट, सर्टिफिकेट, मेडल, खेल उपकरण और ड्रेस बेचने का धंधा ज़ोर शोर से चलता है| हालाँकि कराटे और तायकवांडो में भारत की हालत बेहद खराब है लेकिन इन खेलों का फर्जीवाडा जगजाहिर है|

भारतीय कराटे से जुड़े अधिकारी, कोच और ड्रेस बनाने वाले करोड़ों में खेल रहे हैं| इस खेल में भारतीय खिलाड़ियों ने शायद ही कभी किसी मान्यता प्राप्त आयोजन में कोई पदक जीता हो लेकिन पदक का धंधा खूब चलता है| ब्लैक बेल्ट के काले बाजार में पदक सरे आम खरीदे बेचे जाते हैं| एक सर्वे से पता चला है कि भारत में क्रिकेट के बाद कराटे सबसे बड़ा खेल है, जिसमें लूट खसोट की बड़ी संभावना मौजूद है|

विदेश दौरों की आड़ में हज़ारों लाखों वसूले जाते हैं| हैरानी वाली बात यह है कि यहाँ कोई कायदा क़ानून नहीं चलता 15-16 साल के बच्चे कोच बन जाते हैं| पार्कों, गलियों, बारात घरों, धर्मशालाओं, मंदिरों, खुले मैदानों और यहाँ तक कि जंगलों में सिखाने पढ़ाने का कारोबार चलता है| घंटों या क्लास के हिसाब से सिखाने वाले दस से बीस हज़ार रुपए महीन कमा लेते हैं|

कोरोना की सबसे बड़ी मार इन्हीं गैर मान्यता प्राप्त और कुछ मान्य मास्टरों पर पड़ी है| उनके कमाई पूरी तरह बंद हो गई है| कराटे के दुर्भाग्य की कहानी का असली खलनायक भारतीय कराटे एसोशिएशन(काइ) है जिसने अपने खेल को इस कदर निचोड़ा किउसमे दम ही नहीं बचा| एशियाड और ओलंपिक में शामिल होने की भारतीय संभावनाएँ ख्वाब बनकर रह गई हैं|

अधिकारी वर्षों से कुर्सी की लड़ाई लड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कराटे में पैसे की भरमार है। जितना लूट सको तो लूट। भला दुधारू गाय किसे बुरी लगती है| लेकिन आरोप लगाया जा रहा है कि कराटे के रक्षक ही भक्षक बन चुके हैं और रही सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी है| जो कोच और ट्रेनर काइ (KAI)के अधिकारियों पर हजारों लाखों लुटाते थे बेरोज़गार हो गए हैं| उधर काइ का घमासान भारतीय ओलंपिक संघ तक पहुँच गया है| दो अलग अलग गुट अपना अपना दावा पेश कर रहे हैं|

इस गुटबाजी के कारण पहले से अंतरकलह में डूबी आईओए के प्याले में भी तूफान उठ खड़ा हुआ है| कराटे की लड़ाई अब आईओए की अपनी लड़ाई बन गई है| आरोप प्रत्यारोपों का दौर तेज हो गया है| लेकिन उन कोचों के बारे में कोई नहीं सोच रहा जिनकी कमाई पर उनके परिवार चल रहे थे| चूँकि कराटे बॉडीकांटेक्ट का खेल है इसलिए इसका पटरी पर आना फिलहाल मुश्किल लगता है| लगभग दस लाख परिवारों की दाल रोटी का इंतज़ाम करने वाले खेल को आने वाले दिनों में और गंभीर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं|

लुटे पिटे अभिभावक और कोच लुटेरे पदाधिकारियों के विरुद्ध लामबंद हुए तो कुछ एक को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ सकता है।

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