भव्य स्टेडियम बनाएँगे, जमकर लूट मचाएँगे!

राजेंद्र सजवान
नयी सरकार ने नये तेवरों के साथ दावा किया था कि देश को खेल महाशक्ति बनाना उसकी प्राथमिकता में शामिल है| उसके ज़िम्मेदार अधिकारियों ने तो यहाँ तक कहा कि 2028 तक भारत ओलंपिक पदक तालिका में पहले दस देशों में स्थान बना लेगा और तीस से पचास पदक जीतने में सफल होगा| लेकिन कोरोना काल से पहले देश के अधिकांश खिलाड़ियों के लिए बड़े स्टेडियमों में प्रवेश वर्जित हो चुका था और अब 54 खेल संघों की मान्यता रद्द किए जाने पर खेल मंत्रालय और आईओए के ज़िम्मेदार लोग कह रहे हैं कि स्थगित टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतना आसान नहीं होगा|

चन्द दिन पहले यही लोग कह रहे थे कि भारतीय खिलाड़ी दर्ज़न भर ओलंपिक पदक के दावेदार हैं| ज़ाहिर है देश को धोखा दिया जा रहा है| *बड़े स्टेडियम अर्थात लूट का बड़ा खेल:* यह भी पता चला है कि चूँकि देश को खेल महांशक्ति बनाना है इसलिए राजधानी और अन्य शहरों के खेल स्टेडियमों को अत्याधुनिक बनाए जाने की योजना है| खबर है कि खेल मंत्रालय और भारतीय खेल प्राधिकरंण दिल्ली के तमाम बड़े-छोटे स्टेडियमों को जापान, इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, चीन और तमाम उन्नत देशों की तर्ज पर नवरूपता प्रदान करने के लिए कटिबद्ध हैं और इस दिशा में बाक़ायदा शुरुआत भी हो चुकी है|

यह भी पता चला है कि 1982 के दिल्ली एशियाड के लिए निर्मित जवाहर लाला नेहरू स्टेडियम को चकाचौंध में बदलने के लिए बाक़ायदा आठ हज़ार करोड़ का सौदा भी हो गया है| इसी प्रकार नेशनल स्टेडियम, इंदिरा गाँधी इनडोर स्टेडियम, श्यामा प्रसाद मुखर्जी तरनताल, शूटिंग रेंज और अन्य स्टेडियमों का रंग रूप बदला जाएगा, जिस पर हज़ारों करोड़ खर्च होंगे| कुछ पूर्व खिलाड़ी, खेल जानकार, खेल प्रेमी और विपक्ष कह रहे हैं कि जिन लोगों ने सुरेश कलमाड़ी और तत्कालीन दिल्ली सरकार पर कामनवेल्थ की लूट का आरोप लगाया था, उनकी नीयत में भी खोट है| *मुंगेरी लाल के हसीन सपने:* वाह भारतीय खेल मंत्रालय और उसके सलाहकारों|

स्टेडियमों को लंदन पेरिस सा रंग देना चाहते हैं, जिनमें होटल, रेस्टोरेंट, बार, एम्युजमेंट पार्क, गोल्फ कोर्स, गो कारटिंग जैसी तमाम सुविधाएँ होंगी लेकिन क्या गारंटी है कि उनमें खेल होंगे और खिलाड़ियों के लिए प्रवेश वर्जित नहीं होगा? कोविड 19 के कारण देश के अधिकांश स्टेडियम बंद हैं लेकिन दिल्ली के स्टेडियम तो आम खिलाड़ी के लिए वर्षों पहले बंद हो गए थे| भले ही खेल मंत्रालय नें थू थू के चलते साल की शुरुआत में कुछ स्टेडियमों के दरवाजे खोले लेकिन जब करोड़ों अरबों खर्च किए जाएँगे तो आम खिलाड़ी शायद एसए स्टेडियमों में प्रवेश भी नहीं कर पाएगा| *दिल्ली क्यों बना हॉकी का नरक:* बेशक, अच्छे स्टेडियम और स्तरीय खेल मैदानों के बिना हमारे खिलाड़ी तरक्की नहीं कर सकते|

लेकिन देखने में यह आया है कि जैसे जैसे सुधार और आधुनिकीकरण का दौर चला, हमारे खिलाड़ी खेल मैदानों से दूर होते चले गये| यही कारण है कि हॉकी इंडिया के पूर्व अध्यक्ष डाक्टर बत्रा को यहाँ तक कहना पड़ा कि दिल्ली हॉकी के लिए नरक बन गया है और यहां कोई बड़ा आयोजन नहीं करवाना चाहेंगे| शुरुआत 1951 के पहले एशियाई खेलों से करते हैं| तब नेशनल स्टेडियम में अधिकांश खेल आयोजित किए गये| 1982 के कामनवेल्थ खेलों के लिए नेशनल स्टेडियम में हॉकी टर्फ बिछाई गई और यह कहा गया कि शिवाजी स्टेडियम पर से हॉकी का बोझ कम होगा|

लेकिन आज आलम यह है कि दोनों ही स्टेडियम दिल्ली और देश के खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों की पहुँच से बाहर हो चुके हैं| ध्यान चन्द नेशनल स्टेडियम में कई कई मंत्रालयों के आफ़िस चल रहे हैं और स्टेडियम में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवान तैनात हैं, जोकि खिलाड़ियों को अंदर नहीं घुसने देते| इतना ही नहीं लड़कियों के लिए चेंज रूम की सुविधा भी समाप्त कर दी गई| यही हाल शिवाजी स्टेडियम का है जहाँ नई दिल्ली पालिका परिषद के अपने दफ़्तर चलते हैं और खिलाड़ियों के लिए भी पहले जैसी सुविधाएँ नहीं रहीं|

*सरकार ने की वादाखिलाफी:* 2010 के कामनवेल्थ खेलों की तैयारियों के चलते नेहरू स्टेडियम सहित तमाम स्टेडियमों में चल रहे खेल संघों के कार्यालयों को इस शर्त पर शिफ्ट किया गया गया था कि खेलों के समापन के बाद उनकी वापसी होगी| लेकिन चालीस से अधिक खेल संघों को धोखा दिया गया| उन्हें फिर से स्टेडियमों में जगह नहीं मिल पाई| उन पर कार्यालयों के दुरुपयोग के आरोप लगे| बिजली और पानी के लाखों के बिलों का भुगतान नहीं करने का आरोप भी लगे जोकि सही थे|

बेशक खेल संघों ने स्टेडियमों का दुरुपयोग किया पर बेचारे खिलाड़ियों का क्या दोष! उन्हें किस बात की सज़ा मिली| देश की राजधानी के तमाम स्टेडियम सफेद हाथी साबित हुए हैं, जिनका उपयोग खेल की बजाय अन्य आयोजनों के लिए किया जाता रहा है| तो क्या एसी हालत में हम खेल शक्ति बन पाएँगे!

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