गढ़वाल एफसी के ‘हीरोज’

राजेंद्र सजवान

रविन्द्र सिंह बिष्ट (क्रिएटर)

गढ़वाल हीरोज फुटबाल क्लब(गढ़वाल एफसी) को लेकर हाल ही में वरिष्ठ पत्रकार और अनेक विषयों पर बड़ी पकड़ रखने वाले विवेक शुक्ला का एक शानदार लेख पढ़ने को मिला, जिसमें उन्होने दिल्ली के चैम्पियन फुटबाल क्लब को गढ़वाल और उत्तराखंड की पहचान के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। शायद वह फुटबाल के बहाने आम उतराखंडी को यह अहसास करना चाहते हैं कि वक्त रहते अपनी विरासत और पहचान को जिंदा रखने के लिए प्रयास करें। अब शायद आप पूछना चाहेंगे कि विवेक शुक्ला को पहाड़ियों और गढ़वाल हीरोज की चिंता क्यों होने लगी। जवाब में उन्होने कहा कि वह खुद आधे पहाड़ी हैं और राउज एवेन्यू की सरकारी कालोनी में पले बड़े हुए हैं, जहाँ से गढ़वाल हीरोज और दिल्ली के अधिकांश खिलाड़ी निकल कर आए। कुछ खिलाड़ियों को यह शिकायत है कि लेख में उनका ज़िक्र नहीं किया गया। बेशक, उनकी शिकायत ज़ायज़ है लेकिन शब्द सीमा के चलते ऐसा संभव नहीं हो पाया। चूँकि मैं स्वयं गढ़वाल हीरोज से जुड़ा रहा हूँ इसलिए कुछ सप्ताह पहले प्रकाशित अपने एक लेख में मूल चूल बदलाव के साथ अधिकाधिक खिलाड़ियों और पदाधिकारियों का उल्लेख करना चाहूँगा, इस क्षमा याचना के साथ कि किसी खिलाड़ी का नाम छूट गया हो तो अन्यथा ना लें। इसमे दो राय नहीं कि नवभारत टाइम्स में छपे लेख में स्थानाभाव के चलते ऐसे बहुत से खिलाड़ियों को स्थान नहीं मिल पाया, जिन्होने सालों साल गढ़वाल हीरोज को सेवाएँ दी और कई यादगार जीतों में बड़ी भूमिका निभाई। यह कटु सत्य है कि ना सिर्फ़ गढ़वाल हीरोज अपितु दिल्ली की फुटबॉल की बुनियाद उतराखंड के विस्थापितों पर टिकी है। गढ़वाली और कुमाऊंनी खिलाड़ियों के योगदान से दिल्ली की फुटबॉल पिछले पचास-साठ सालों से खूब फलीफूली है। सिर्फ़ गढ़वाल हीरोज ही नहीं, शिमला यंग्ज़, नई दिल्ली हीरोज, यंगमैन, मून लाइट, बीबी स्टार्स, मुगल्स, नेशनल्स, मून लाइट जैसे क्लबों के स्टार खिलाड़ी उतराखंडी ही रहे है।

गढ़वाल हीरोज के नक्शे कदम पर गढ़वाल डायमंड, उत्तरांचल हीरोज और उत्तराखंड क्लब भी धीमे धीमे आगे बढ़ रहे हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले सालों में उत्तराखंडी मूल के क्लब और खिलाड़ियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी और शायद आने वाले सालों में पहाड़ी खिलाड़ी देश की राजधानी की फुटबाल को अपने इशारे पर नचाएंगे।गढ़वाल हीरोज, गढ़वाल दायमंड, उत्तरांचल और उत्तराखंड क्लबों के साथ यह विडंबना है कि उनकी भूमिका सिर्फ़ अच्छे खिलाड़ी तैयार करने तक सीमित रही है। यहाँ से निकलकर कई खिलाड़ी राज्य और देश के लिए खेले, जिनकी संख्या सैकड़ों मे है लेकिन जिस सम्मान के हकदार थे बहुत कम को मिल पाया।

डूरंड, डीसीएम और देश के कई बड़े आयोजनों मे भाग लेकर क्लब और उसके खिलाड़ियों ने खूब नाम कमाया है ।
लेकिन अब वक्त आ गया है कि इन खिलाड़ियों को नार्थ ईस्ट के प्रदेशों की तर्ज पर फुटबॉल को अपनाना होगा। सरकार और राज्य सरकार हर प्रकार से समर्थन देने के लिए तैयार हैं। ऐसे मे एकजुटता और संयुक्त प्रयासों से दुनियाँ के सबसे लोकप्रिय खेल मे उत्तराखंडी मूल के खिलाड़ी भी अपनी अलग पहचान बना सकते हैं।गढ़वाल हीरोज के कुछ प्रमुख खिलाड़ी: कांता प्रसाद, सुखपाल बिष्ट, ओम प्रकाश नवानी, गुमान सिंह रावत, जगदीश रावत, कन्ह्या रावत, जीव आनंद उपाध्याय, राजा राम, विजय राम ध्यानी, केएस रावत, त्रिलोक अधिकारी,एब्बे और मीना(नाइजीरिया), कुलदीप रावत, भीमभंडारी, वाइ एस असवाल, वीरेंद्र रावत, हरेन्द्र नेगी, रघुबीर बिष्ट, रवीन्द्र रावत, कमल जदली(गुड्डू), राधा बल्लभ सुन्दरियाल, राजेंद्र सजवान, किशन, स्व. भोपाल रावत(गोपी), वीरेंद्र मालकोटि, स्व. दिलावर नेगी, राजेंद्र अधिकारी, सेमसन मेसी, सुब्रामन्यम, स्व रूबिन सतीश,रवि राणा, सजीव भल्ला, दिगंबर बिष्ट, चंदन रावत, राजेंद्र अधिकारी,इंदर राणा, दिनेश रावत, पुष्पेंद्र तोमर, कबीर सोम, विपिन भट्ट, भरत नेगी, एच एसबिष्ट(बल्ली), दीवान सिंह, स्व.माधवा नंद, लक्ष्मण बिष्ट, रवि भाकुनी, प्रेम जमनाल, धर्मेन्द्र खरोला, भूपेंद्र रावत, भूपेंद्र ठाकुर, कामेई, पारितोष, मनोज गोसाईं, सुनील पटवाल, दीपक, आशीष पांडे और कई अन्य खिलाड़ियों ने गढ़वाल हीरोज को राजधानी का चैम्पियन क्लब बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

पदाधिकारी:
केसर सिंह नेगी, रंजीत रावत, एचएसभंडारी, मगन पटवाल, त्रिभुवन रावत, बी एस नेगी, अनिलनेगी,दयाल परमार, रतन रावत। गढ़वाल हीरोज के खिलाड़ियों की खास बात यह रही कि उनमें से ज़्यादातर ने कभी किसी कोच से ट्रेनिंग नहीं ली। अधिकांश पैदायशी फुटबॉलर थे और राउज एवेन्यू, सेवा नगर, अलीगंज, किदवई नगर, लोधी कालोनी, पंचकुया रोड, आरके पुरम और मोतीबाग के पार्कों और पथरीले मैदानों में खेल कर बड़े हुए। चाय- मट्ठी उनकी रेफ्रेशमेंट रही। स्कूल स्तर पर नामी कोच रमेश चंद्र देवरानी से गुर सीखने वाले अनेक खिलाड़ी देश के लिए खेलने में सफल रहे। कुछ ऐसे खिलाड़ियों का ज़िक्र किया जा सकता है, जो ना सिर्फ़ शानदार और जानदार थे अपितु उन्हें कई बड़े क्लबों से आफर आए लेकिन परिवारिक कारणों से आगे नहीं बढ़ पाए।रक्षापंक्ति के खिलाड़ियों में कांता प्रसाद और सुखपाल बिष्ट अपने खेल कौशल के दम पर क्रमश: ईएमई और सीमा बल के कप्तान बने तो गुमान सिंह रावत और भीम सिंह भंडारी अभूतपूर्व थे। उन्हें बंगाल और पंजाब के नामी क्लबों ने अपने बेड़े में शामिल करने का निमंत्रण दिया। जगदीश रावत , एच एस नेगी, कमल, रवीन्द्र रावत, लक्ष्मण बिष्ट, माधवा नंद, रवि राणा और कई अन्य खिलाड़ियों ने अपनी अलग पहचान भी बनाई। खिलाड़ी के बाद कोच का डायत्व निभाने में सुखपाल बिष्ट और रवि राणा का योगदान सर्वोपरि रहा है। ख़ासकर, रवि राणा ने खिलाड़ी और कोच के रूप में लंबा योगदान दिया।

One thought on “गढ़वाल एफसी के ‘हीरोज’

  1. Navbhart Times ki jo kammi vo aapna puri kar de bahoot khushi hui parkar. Sabhi ko bahoot-bshoot mubark, khas kar aapko likhna k liya. Thanks

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