फ़ेडरेशन के फ़ैसले से फुटबाल दिल्ली में घमासान

राजेंद्र सजवान

रविन्द्र सिंह बिष्ट (क्रिएटर)

दिल्ली और देश में महामारी के चलते फुटबाल मैदान में नहीं खेली जा रही लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया पर जो कुछ चल रहा है उसे देखते हुए कोई भी अनुमान लगा सकता है कि आख़िर राजधानी में यह खेल रसातल में क्यों धसक रहा है। दरअसल विवाद का कारण अखिल भारतीय फुटबाल फ़ेडेरेशन(एआईएफएफ) का वह फ़ैसला है जिसमें राज्य इकाइयों को उनके काम और उपलब्धियों के आधार पर श्रेष्ठता क्रम में बाँटा गया है। इस रैंकिंग के अनुसार पश्चिम बंगाल ने पहला स्थान हासिल किया है तो महाराष्ट्र दूसरे और केरल तीसरे नंबर पर है। तत्पश्चात कर्नाटक, तमिल नाडु, मेघालय, पंजाब, गोवा, मिज़ोरम, जम्मू-कश्मीर और उड़ीसा क्रमशः चौथे से 11वें स्थान पर आते हैं

हालाँकि फ़ेडेरेशन के श्रेष्ठता क्र्म में मणिपुर, सिक्किम, आंध्र प्रदेश जैसे प्रदेशों को स्थान नहीं मिल पाया है, जहाँ फुटबाल का स्तर और लोकप्रियता अच्छी ख़ासी रही है लेकिन मरोड़े दिल्ली की फुटबाल के कर्णधारों के पेट में पड़ रहे हैं। दिल्ली साकर एसोसिएशन के पदाधिकारी और क्लब अधिकारी फ़ेडेरेशन द्वारा घोषित रैंकिंग से ख़ासे नाराज़ है और दो गुटों में बँट गये हैं।सोशल मीडिया पर वे एक दूसरे को गरियाने और नीचा दिखाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। एक पक्ष अध्यक्ष शाजी प्रभाकरण के उन प्रिय जनों का है जिनमे से ज़्यादातर शुरुआती दिनों में शाजी के कट्टर दुश्मन थे।लेकिन अब वे सभी अध्यक्ष की गोद में बैठे हैं। दूसरा धड़ा वह है जिसे लगता है कि दिल्ली की फुटबाल ग़लत हाथों में खेल रही है और फुटबाल के नाम पर सिर्फ़ हवा हवाई चल रही है। वरिष्ठ पदाधिकारियों और क्लब अधिकारियों की अगुवाई हेम चन्द, डीके बोस, राजीव गुप्ता जैसे अनुभवी लोग कर रहे हैं। भले ही इनमें भी कुछ अवसरवादी हैं लेकिन हाल फिलहाल उनका मकसद राजधानी की फुटबाल को उन लोगों से बचाना है, जोकि अध्यक्ष को बरगला रहे हैं या उसके गलत निर्णयों पर भी वाह वाह कर रहे हैं।

असंतुष्ट पूछ रहे हैं कि दिल्ली को फ़ेडेरेशन के श्रेष्ठता क्र्म में स्थान क्यों नहीं मिल पाया? इसके लिए उन्होने डीएसए को आड़े हाथों लिया है और कहा कि पिछले टीन सालों में दिल्ली की फुटबाल ने बहुत कुछ खोया है। आरोप लगाए गये हैं कि बड़ा और महँगा आफ़िस खोला गया, जिसमें अपने पसंदीदा कर्मचारी भर्ती किए गए; उनके वेतन पर लाखों खर्च किए जा रहे हैं लेकिन फुटबाल पर खर्च करने के लिए ख़ज़ाने में पैसा नहीं है।

फ़ेडेरेशन के अनुसार जिन 11 राज्यों को सम्मान मिला है , उन्होने फ़ीफ़ा के नियमानुसार विभिन्न क्षेत्रों में सराहनीय काम किया है। अपने अपने राज्यों में वार्षिक लीग मुकाबलों का आयोजन, आयु वर्ग के फुटबाल प्रोमोशन कार्यक्र्म, रेफ़री और कोचों के लिए सर्टिफिकेट कोर्स, पुरुषों के साथ साथ महिला फुटबाल प्रोत्साहन और अन्य गतिविधियों के आयोजन में इन राज्यों ने बेहतर काम कर फ़ेडेरेशन को प्रभावित किया और बेहतर अंक अर्जित करने में सफल रहे हैं। लेकिन दिल्ली की फुटबाल में जाने माने हस्ताक्षर रहे नरेंद्र भाटिया, हेम चन्द, डीके बोस और राजीव गुप्ता को लगता है कि दिल्ली की फुटबाल ने ग़लत राह पकड़ ली है। डीएसए का चोला बदलकर “फुटबाल दिल्ली” नाम देने और संविधान में छेड़ छाड को इन अधिकारियों ने गहरी साजिश करार दिया है। उनके अनुसार दिल्ली की फुटबाल इसलिए प्रमुख राज्यों में स्थान नहीं बना पाई क्योंकि दिल्ली में खेल के नाम पर महज़ तमाशेबाजी चल रही है। अपने अपनों को रेबडियाँ बाँटना और तमाम अनियमितताएँ ही दिल्ली की फुटबाल का चरित्र रह गया है।

सच तो यह है कि दिल्ली की फुटबाल उसी राह पर चल रही है, जो राह पितृ संस्था को पसंद है। कौन नहीं जानता कि फुटबाल फ़ेडेरेशन भारतीय फुटबाल की बर्बादी की जड़ रही है। भले ही प्रफुल्ल पटेल फ़ीफ़ा के अधिकारियों को खुश करने की योग्यता रखते हैं लेकिन उनके कार्यकाल में भारत ने फुटबाल में कोई तीर नहीं चलाया। यदि चलाया होता तो हमें बांग्ला देश और अफ़ग़ानिस्तान जैसी टीमों के सामने शर्मसार नहीं होना पड़ता। दास मुंशी के बाद पटेल साहब भी सुधार का कोई काम नहीं कर पाए। कौन नहीं जानता कि अंडर 17 पुरुष और महिला फ़ीफ़ा कप के आयोजन भारत को क्यों मिले और उनकी मेजबानी से भारतीय फुटबाल का क्या भला होने वाला है! ठीक इसी प्रकार के आरोप फुटबाल दिल्ली पर भी लगाए जा रहे हैं। हिसाब किताब में गड़बड़, जी हुजुरों को विभिन्न कमेटियों में स्थान देना, कुछ खास लोगों के लिए तमाम कायदे कानून ताक पर रखना और विरोध करने वालों को निकाल बाहर करना दिल्ली की फुटबाल का चलन बन गया है। नतीजन कुछ क्लब अधिकारियों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया है।

हैरानी वाली बात यह है कि दिल्ली के अधिकारी और अवसरवादी सोशल मीडिया पर जमकर धमाल मचाते हैं, एक दूसरे को बुरा भला कहते हैं लेकिन वार्षिक और अन्य बैठकों में ज़्यादातर की नाराज़गी फुर्र हो जाती है। कोरोना काल में तमाम संस्था, संगठनों ने अपने गिले शिकवे भुला कर नयी शुरुआत की तरफ कदम बढ़ाने पर ज़ोर दिया है पर दिल्ली के फुटबाल आका वही पुराना राग अलाप रहे हैं। एक पक्ष कहता है कि भविष्य की उम्मीदें धूमिल हो रही है, कलबों और लीग आयोजनों का अस्तित्व ख़तरे में है तो विरोधी कहते हैं कि जो शाजी प्रभाकरण उनकी टीम ने किया आजतक कोई भी नहीं कर पाया।

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