सिर्फ़ विदेशी कोच: स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर तमाचा!

राजेंद्र सजवान

रविन्द्र सिंह बिष्ट (क्रिएटर)

भारत सरकार देश को आत्म निर्भर बनाने और स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए दृढ़ संकल्प है। देशवासियों को आत्मनिर्भर बनने का सबक सिखाया जा रहा है और देशवासियों को भी सरकार की मंशा से परहेज नहीं है। लेकिन भारतीय खेल प्राधिकरण विदेशी के चंगुल से मुक्त नहीं हो पा रहा। ताज़ा उदाहरण 11 ओलंपिक खेलों के 32 विदेशी कोचों का अनुबंध आगे बढ़ाए जाने का है। करार के अनुसार उन्हें अगले साल 30 सितंबर तक जारी रखने के लिए कहा गया है। हालाँकि इनमें से ज़्यादातर का अनुबंध सितंबर 2020 तक के लिए था लेकिन कोविड 19 के कारण ओलंपिक खेल अगले साल तक के लिए स्थगित हो गए हैं। इसके साथ ही विदेशी कोचों के अनुबंध को भी एक साल के लिए बढ़ाना पड़ा है।

स्वदेशी क्यों नहीं?:
विदेशी कोचों का कार्यकाल बढ़ाए जाने को लेकर कुछ कोच फब्ती कस रहे हैं कि एक तरफ तो सरकार और उसके तमाम मंत्रालय स्वदेशी को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं तो दूसरी तरफ हालत यह है कि अधिकांश खेलों से भारतीय कोच लगभग गायब हो रहे हैं। कुछ जाने माने और अनुभवी कोाचों ने बाक़ायदा सरकार से गुहार भी लगाई है कि उनकी अनदेखी ना कि जाए। उनके अनुसार खिलाड़ी भारतीय कोच और गुरु खलीफा तैयार करते हैं और नाम एवम् मलाई खाने के लिए विदेशियों को आगे कर दिया जाता है।

अपने कोचों का अपराध क्या है ?:
देश के खेल जानकार और कोच सरकार और खेल मंत्रालय से पूछ रहे हैं कि विदेशी कोचों ने भारत को कितने ओलंपिक और विश्व चैम्पियन दिए हैं और उनकी उपस्थिति का औचित्य क्या रह गया है? वह पूछ रहे हैं कि दो ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार को किस विदेशी ने ट्रेनिंग दी, किसने योगेश्वर दत्त, फोगाट बहनों, सिंधु, सायना, साक्षी, विजेंद्र सिंह और तमाम ओलंपिक पदक विजेताओं को सिखाया पढ़ाया? भले ही अभिनव बिंद्रा और मैरी काम अपने कोच का नाम छिपाएँ पर उन्हें इसी देश के गुरुओं ने ट्रेंड किया। गुरु हनुमान, नांबियार, रहींम, महाबली सतपाल, राज सिंह, महावीर फोगाट, जगदीश, ओपी भारद्वाज, पुलेला गोपी चन्द और कई अन्य जाने माने कोच इसी धरती ने पैदा किए, जिन्हें विदेशी के फेर में भुलाए जाने की साजिश रची जा रही है। सरकार और साई से पूछा जा रहा है कि स्वदेशी कोाचों का अपराध क्या है और गोरी चमडी से इस कदर लगाव क्यों है?

हॉकी को भाये विदेशी:
इसे भारतीय हॉकी की बिडंबना कहा जाएगा कि उसे आठ ओलंपिक स्वर्ण दिलाने वाले कोच अपने थे। या यूँ भी कह सकते हैं कि जब जब भारतीय हॉकी ने अच्छा प्रदर्शन किया उसके पीछे अपने कोचों की बड़ी भूमिका रही। लेकिन मास्को ओलंपिक के बाद प्रदर्शन में गिरावट के चलते कोचों को बलि का बकरा बनाने की परंपरा शुरू हुई और आज तक अपने कोच भारतीय हॉकी और उसके कर्णधारों का विश्वास नहीं जीत पाए। वर्तमान टीम पर सरसरी नज़र डालें तो उसे विदेशियों द्वारा ही सजाया सँवारा गया है। महिला टीम भी विदेशी देख रहे हैं। हॉकी इंडिया ने तो यहाँ तक एलान कर दिया है कि टोक्यो ओलंपिक में दोनों ही टीमें पदक की दावेदार हैं। खिलाड़ी, कोच और हॉकी इंडिया को लगता है कि विदेशी कोच फिटनेस के मामले में कारगर रहे हैं| बाकी ओलंपिक के नतीजे असलियत बयाँ करेंगे। टोक्यो ओलंपिक तक इंतजार कर लेते हैं।

महँगे और जोखिम भरे:
स्वदेशी का ढोलपीटने वालों से अपने कोच पूछ रहे हैं कि लाखों-करोड़ों के विदेशी कोाचों का फ़ायदा क्या हुआ। जब रिज़ल्ट वही शून्य रहना है तो अपने सस्ते और उपेक्षित कोच क्या बुरे हैं! एक तो खेल बज़ट का हाल बुरा है, उपर से करोड़ों का खर्च विदेशियों पर किया जाता है। इतना ही नहीं आरोप यह भी लगे हैं कि विदेशी और ख़ासकर सोवियत देशों के कोच भारतीय खिलाड़ियों को कामयाबी का शार्ट कट सिखा रहे हैं। खिलाड़ियों को डोप लेने की कला भी इन्हीं विदेशियों ने सिखाई है जिसके चलते भारतीय खिलाड़ी हर वक्त नाडा और वाडा के रडार पर रहते हैं| देश का नाम अलग से खराब हो रहा है।

कौन सा तीर चला दिया:
विदेशी के प्रति भारतीय मोह की बात करें तो एथलेटिक, फुटबाल और हॉकी में अधिकाधिक विदेशी कोचों की सेवाएँ ली गईं लेकिन नतीजे हमेशा निराशाजनक रहे| एथलेटिक में हालत यह है कि सौ साल में एक भी ओलंपिक पदक नहीं जीत पाए तो फुटबाल में लगातार पिछड़ते चले गए| हर विदेशी कोच भारतीय फुटबाल को सोया शेर बताता है और जाते जाते हमारी फुटबाल को मरी हुई करार देता है| हॉकी भी लगातार विदेशी कोच बदल रही है परंतु नतीजे पिछले चालीस सालों से नहीं बदल पाए| बाकी खेलों में भी यही चल रहा है लेकिन फ़ेडेरेशन और साई हैं कि उन्हें गोरी चमडी भा गई है| वैसे यह जाँच का विषय है की बार बार पिटे हुए विदेशियों पर करोड़ों क्यों खर्च किए जा रहे हैं? क्यों आत्मनिर्भरता का ढोल पीटने वाले स्वदेशी की अनदेखी कर रहे हैं?

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