खेल रत्न : ओलंपिक पदक हो निम्नतम योग्यता

राजेंद्र सजवान

रविन्द्र सिंह बिष्ट (क्रिएटर)

देर से ही सही राष्ट्रीय खेल अवॉर्ड समिति 2020 क गठन हो चुका है और दो-तीन दिनों में इस बार के राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड का फैसला हो जाएगा। यह अवार्ड किस खिलाड़ी को मिलेगा और कौन 29 अगस्त को राष्ट्रपति महोदय के हाथों सम्मानित होगा, जल्द फ़ैसला हो सकता है। वैसे तो अर्जुन अवॉर्ड, द्रोणाचार्य अवॉर्ड और ध्यांचंद अवार्डों का फ़ैसला भी किया जाना है लेकिन भारतीय खेल जगत की सबसे बड़ी उत्सुकता खेल रत्न को लेकर होती है, जिसे पाने वाले को पुरस्कार और प्रशस्ति पत्र के साथ साढ़े सात लाख रुपये दिए जाते हैं। कई खिलाड़ी दावेदार हैं लेकिन कौन। भाग्यशाली होगा यह अवार्डों के लिए गठित समिति की सूझ बूझ पर निर्भर करता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि फैसला सर्वमान्य होगा और कोई भी खिलाड़ी सवाल खड़े नहीं करेगा, जैसा कि अक्सर होता आया है।

बिंद्रा पर भी उठा था सवाल:
1984 से पाँच सालों तक देश के प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय राजीव गाँधी के नाम पर गठित पुरस्कार को सबसे पहले 1991-92 के लीए शतरंज के बेताज बादशाह विश्व नाथन आनंद ने प्राप्त किया था। तब एक साल में सबसे शानदार प्रदर्शन को कसौटी बनाया गया था जिसे पुरस्कार चयन समिति द्वारा 1914 में संशोधित किया गया और चार सालों के प्रदर्शन के आधार पर खेल रत्न का चयन किया जाने लगा। शुरुआती वर्षों में हर साल एक खिलाड़ी को यह सम्मान देने का निर्णय लिया गया लेकिन 1993-94 में परंपरा को तोड़ा गया और नौकायन टीम के लिए होमी मोती वाला और पुष्पेंद्र गर्ग को खेल रत्न दिया गया। तत्पश्चात सात अन्य अवसरों पर भी एक से अधिक खिलाड़ी पुरस्कार पाने में सफल रहे। कारण, खेल संघों और आईओए के दबाव और बढ़ते कोर्ट केसों के चलते चयन समितियाँ विवश होकर रह गईं ।

खेल मंत्रालय मूक दर्शक बना रहा कुछ एक मौके ऐसे भी आए जब सम्मान पाने वाले खिलाड़ी की उपलब्धियों पर उंगली उठी। कुछ अवसरों पर पैरालंपिक खिलाड़ियों को लेकर भी सवाल खड़े किए गए। इतना ही नहीं 2001 में जब अभिनव बिंद्रा खेल रत्न बने तो चयन समिति पर आरोप लगे क्योंकि तब तक बिंद्रा महज़ विश्व चैम्पियन बने थे। हालाँकि उन्होने 2004 में स्वर्ण पदक जीत कर अपनी श्रेष्ठता साबित की।

ओलंपिक कांस्य हो निम्नतम योग्यता:
कुल खेल रत्न अवार्डों पर नज़र डालें तो चौदह खेलों को 38 खेल रत्न मिले हैं, जिनमें भारोतोलन, बैडमिंटन, कुश्ती, निशानेबाज़ी, मुक्केबाज़ी और टेनिस ही ऐसे खेल हैं जिनमें ओलंपिक पदक जीतने वाले खिलाड़ी शामिल हैं। पैरा एथलीट देवेन्द्र झांझरिया और दीपा मलिक ने भी ओलंपिक पदक जीता हैं। बाकी को एशियाड, कामनवेल्थ खेलों या अन्य आयोजनों में दमदार प्रदर्शन का इनाम मिला है। ओलंपिक पदक विजेताओं में कारणम मल्लेश्वरी, लियन्डर पेस, अभिनव बिंद्रा, राज्यवर्धन राठौर, मैरी काम, विजेंद्र सिंह, सुशील कुमार, साइना नेहवाल, गगन नारंग, विजय कुमार, योगेश्वर दत्त, पीवी सिंधु और साक्षी मलिक के नाम शामिल हैं|

खेल रत्न को पाना हर खिलाड़ी का सपना होता है। लेकिन यह भी सच है कि इस सम्मान का हकदार वही बन पता है जिसने आजीवन कड़ा संघर्ष किया हो और कामनवेल्थ खेल, एशियाड, पैरालंपिक खेलों और ओलंपिक खेलों में अभूतपूर्व प्रदर्शन किया हो। कुछ एक ऐसे खिलाड़ी भी खेल रत्न बने जिन्होने निर्धारित मानदंडों को हासिल नहीं किया है। हालाँकि उनके नामों का उल्लेख ठीक नहीं लगता लेकिन अधिकांश खेल जानकार, खिलाड़ी एक्सपर्ट्स मानते हैं कि खेल रत्न की प्रतिष्ठा और गौरव को यदि बनाए रखना है तो कम से कम ओलंपिक पदक इस श्रेष्ठ खेल अवॉर्ड की निम्नतम योग्यता होनी चाहिए।

दीपा कर्मकार पर सवाल:
भले ही दीपा कर्मकार ने रियो ओलंपिक जिम्नास्टिक में चौथा स्थान अर्जित किया लेकिन उसके जैसा प्रदर्शन करने वाले अनेक खिलाड़ियों की अनदेखी की गई। हैरानी वाली बात यह है कि उसने एशियाड कामनवेल्थ खेलों और अन्य स्पर्धाओं में भी कोई करिश्मा नहीं किया। इसी प्रकार के सवाल बिलियर्ड्स, नौकायन, भरोतोलन, एथलेटिक, क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, निशानेबाज़ी जैसे खेलों के साधारण विजेताओं पर भी खड़े किए गए।

क्रिकेट नियमों का पालन करे:
इसमें दो राय नहीं कि क्रिकेट भारत का सबसे लोकप्रिय खेल है और यह खेल अपने दम पर खड़ा है। लेकिन जब कभी किसी क्रिकेट खिलाड़ी को अर्जुन या खेल रत्न मिलता है तो अन्य खेल आँखें तरेरने लगते हैं। अनेक अवसरों पर आरोप लगे कि क्रिकेट बाकी खेलों की तरह सरकारी दिशानिर्देशों को नहीं मानता और किसी प्रकार के नियम क़ानूनों को मानने के लिए भी बाध्य नहीं है।

लेकिन भला सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली के नाम पर सवाल खड़े करने का साहस किस चयन समिति में हो सकता है! उन्हें खेल रत्न मिला जिसके हकदार बनते हैं। दरअसल, क्रिकेट को खेल अवार्डों से दूर रखने की बात इसलिए भी की जाती है क्योंकि जब कभी इस खेल को एशियाड या कमानवेल्थ खेलों में शामिल किया जाता है तो भारतीय क्रिकेट बोर्ड और खिलाड़ी निजी स्वार्थों के चलते राष्ट्रीय टीम को महत्व नहीं देते। बेहतर होगा कि खेल मंत्रालय ऐसे नियम बनाए कि भविष्य में क्रिकेट भी अन्य खेलों की तरह दिशा निर्देशों का पालन करे।

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