ढोल की पोल: तो क्या विदेशी कोच बनाएँगे आत्मनिर्भर?

राजेंद्र सजवान
आत्मनिर्भरता की तरफ तेज कदम बढ़ाने वाले भारत ने चीन पर निर्भरता की केंचुली उतार कर दिखा दिया है कि हम में है दम और हम अपने दम पर बहुत कुछ करने की क्षमता रखते हैं। भले ही हम फ्रांस, अमेरिका और तमाम देशों से खरीदे गये जहाज़ों और टैंको पर इंडिया गोद कर हुंकार भरें लेकिन एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ आज भी हम पूरी तरह विदेशी के चंगुल में फँस कर रह गए हैं। बेशक, खेलों में हम दुनिया के सबसे फिसड्डी राष्ट्र हैं और इस क्षेत्र में तब तक प्रगति संभव नहीं लगती जब तक हम पूरी तरह स्वदेशी को नहीं अपना लेते, ऐसा देश के जाने माने खिलाड़ियों, खेल प्रशासकों, गुरु-ख़लीफाओं और खेल प्रेमियों का मानना है।

भारतीय खेलों पर सरसरी नज़र डालें तो माल हमारा, कारखाने हमारे और पैसा हमारा लेकिन तैयार माल विदेशियों की देख रेख में मार्केट में पहुँच रहा है, जोकि स्तरीय कदापि नहीं है। इस बात को सीधे सीधे यूँ भी कर सकते हैं कि ग्रासरुट, स्कूल, कालेज और उच्च स्तर पर हमारे खिलाड़ियों को अपने कोच और गुरु सिखाते पढ़ाते हैं और जब खिलाड़ियों को एशियाड, कामनवेल्थ, विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक में उतारने की बारी आती है तो देशी मिट्टी और अपनी आबो हवा में पले बढ़े खिलाड़ियों को विदेशी कोाचों के हवाले कर दिया जाता है। नतीजा आप हम सभी जानते हैं।

इधर पिछले कुछ सालों में भारतीय खेल आकाओं ने देश को खेलों में आत्म निर्भर बनाने और अमेरिका और चीन से टकराने का मूड बना लिया है। खेल मंत्रालय ने बाक़ायदा खेलो इंडिया और फिट इंडिया जैसे नारे उछाल कर देश को गदगद कर दिया है। खेल पुरस्कारों की संख्या दुगुनी-चौगुनी कर दी गई है। पुरस्कार पाने वालों को दी जाने वाली पुरस्कार राशि में भी कई गुना की बढ़ोतरी की गई , जोकि स्वागतयोग्य है। लेकिन क्या यह सब करने से देश खेल महाशक्ति बन जाएगा और क्या ऐसा करने से हमारे खेल और खिलाड़ी आत्मनिर्भरता को हासिल कर लेंगे?

जहाँ तक अमेरिका, चीन, जापान, कोरिया, इटली, फ्रांस, रूस आदि देशों की बात है तो उनकी तरक्की का बड़ा कारण यह है कि इन देशों ने खेलों में आत्मनिर्भरता को हासिल किया है। कुछ एक अपवादों को छोड़ कर इन देशों के खिलाड़ी अपने गुरुओं की शरण में शिक्षा दीक्षा लेते हैं। उनकी बुनियाद स्वदेशी से तैयार हुई है और जब उनका कोई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय पदक जीतता है तो उसकी कामयाबी को किसी विदेशी के साथ नहीं जोड़ा जाता।

दुर्भाग्य भारतीय खेलों का, खिलाड़ी देश की मिट्टी और मैदानों में तैयार होते हैं और अधिकांश गुमनाम गुरु उन्हें सिखाते-पढ़ाते हैं लेकिन जब किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन में भाग लेने की बारी आती है तो उन्हें लाखों करोड़ों पाने वाले विदेशी कोचों के हवाले कर दिया जाता है। हालत यह है की आत्मनिर्भरता को प्रमुखता देने वाले भारत महान के तमाम अंतराष्ट्रीय खिलाड़ी विदेशी कोचों से ट्रेनिंग पा रहे हैं।

आगामी ओलंपिक खेलों में भाग लेने वाले अधिकांश खेलों के चीफ़ कोच विदेशी हैं। लेकिन 1985 में स्थापित द्रोणाचार्य अवार्ड 132 ऐसे भारतीय कोचों को मिल चुका है, जिनमें से ज्यादातर ने कोई बड़ा और नामी खिलाड़ी तैयार नहीं किया। भारतीय खेलों का बड़ा दुर्भाग्य यह भी रहा है कि गुरु का सबसे बड़ा सम्मान पाने वाले पचास फीसदी कोच सम्मान की कसौटी पर खरे नहीं माने जाते। यहाँ तक आरोप लगाए जाते हैं कि विदेशियों को बढ़ावा दिया जा रहा है और फ़र्ज़ी कोच राष्ट्रीय सम्मान झटक रहे हैं। ऐसे तो हमारे खेल स्वावलंबी नहीं बन पाएँगे। आत्मनिर्भरता वाली बात तो कहीं भी नज़र नहीं आती।


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