स्थानीय खेल मीडिया की प्राथमिकता नहीं रहे!
राजेंद्र सजवान
एसजेएफआई (भारतीय खेल पत्रकार संघ) अपनी स्थापना की गोल्डन जुबली देश की राजधानी के खेल पत्रकारों की मेजबानी में 13 से 16 फरवरी तक मनाने जा रहा है। बेशक, देश की राजधानी के लिए गर्व का विषय है। यही मौका है जब देश के तमाम खेल पत्रकार पिछले पचास सालों में अपनी उपलब्धियों की समीक्षा कर सकते हैं। यह जान सकते हैं कि बीते सालों में हमने क्या खोया और क्या कुछ नया किया है।

मूल विषय पर जाने से पहले 1978-79 की दिल्ली फुटबॉल लीग के एक रोमांचक मैच का उल्लेख करने की इजाजत चाहता हूं, जिसमें गढ़वाल हीरोज के लिए खेलते हुए स्टूडेंट्स के गोलकीपर तारिक का पंच चेहरे पर लगा और गोल जमाने के बावजूद मुझे मैदान छोड़ना पड़ा। बात आई गई हो गई लेकिन सुबह घर पर यार दोस्तों और नाते रिश्तेदारों का ताँता लग गया। पता चला कि राजधानी के तमाम बड़े छोटे अख़बारों में पहले पेज पर मेरे चोटिल होने की खबर फोटो के साथ छपी थी। हिंदुस्तान, टाइम्स ऑफ़ इंडिया, एक्सप्रेस, जनसत्ता और नवभारत जैसे राष्ट्रीय अख़बारों ने एक स्थानीय खबर को मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया। आज शायद इसे शायद ही कोई सच्चाई माने। लेकिन यह सौ फीसदी सच है की वह दौर स्थानीय खेल पत्रकारिता का गोल्डन पीरियड था। ख़बरों की शुरुआत स्थानीय ख़बरों से होती थी। तब शायद ही कोई स्थानीय खबर छूट पाती थी। लेकिन आज आलम यह है कि बड़ी से बड़ी और महत्वपूर्ण खबरों को भी स्थान नहीं मिल पाता।

बेशक़, अधिकाधिक अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय गतिविधियों के चलते मीडिया की प्राथमिकता बदल गई है। यह भी सही है कि अधिकाधिक क्रिकेट आयोजनों और अपनी क्रिकेट टीम के अच्छे प्रदर्शन के कारण अन्य ख़बरों को जगह नहीं मिल पाती। खासकर, हिंदी के अखबार अपने खेलों की खबर लेने से परहेज करते हैं। हो सकता है कि स्थानाभाव के चलते ऐसा होता हो। लेकिन यह सच है कि क्रिकेट आम भारतीय की तरह मीडिया की कमजोरी बन गया है। नतीजन स्थानीय और राष्ट्रीय खेल ख़बरें देश के अख़बारों से लगभग गायब हो गई हैं। ऊपर से बड़ी मार यह पड़ी है कि क्रिकेट 2028 के ओलंपिक में शामिल हो गया है। अर्थात अन्य खेलों कि मुसीबतें और बढ़ सकती हैं लेकिन दोष सिर्फ क्रिकेट का नहीं है। अन्य खेलों ने अनियमितता, अव्यवस्था और अनुशासनहीनता के चलते हथियार डाल दिए हैं।
