…फिर भी महिला फुटबॉल मांगे मोर!
राजेंद्र सजवान
इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय महिला खिलाड़ी कुछ एक खेलों में अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में बेहतर रिजल्ट दे रही हैं। लेकिन यह भी सच है कि टीम खेलों में हमारी लड़कियां खुलकर सामने नहीं आ पाई हैं। मसलन फुटबॉल को ही लें तो इस खेल में प्राय: निम्न आय वर्ग की, गांव-देहात की और विशुद्ध देसी रहन-सहन वाली खिलाड़ी ही भाग लेती हैं। उच्च-मध्यम आय वर्ग की लड़कियां प्राय: तैराकी, निशानेबाजी, टेनिस, टेबल टेनिस, बैडमिंटन, स्क्वैश, गोल्फ आदि खेलों को करियर के रूप में चुनती हैं।

मूल विषय पर चले तो पिछले दिनों खेले गए एएफसी एशियन फुटबॉल टूर्नामेंट में भारतीय महिला टीम की दो वजहों से फजीहत हुई। एक तो खिलाड़ियों को बेतरतीब बेबी साइज ड्रेस पहनकर खेलना पड़ा। दूसरे हमारी लड़कियां अपने तीनों मैच हार गईं। जापान ने तो हमें 11-0 से धो डाला था। बेशक, भारतीय फुटबॉल की जमकर जगहंसाई हुई। बुरी तरह पिटी टीम को ‘अनफिट’ ड्रेस के कारण बहानेबाजी का मौका भी मिल गया। खबर है कि अब भारतीय महिला फुटबॉल को संचालित करने वाली कमेटी ने ‘ड्रेस’ का मामला उछालकर ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ) के अध्यक्ष कल्याण चौबे से गुहार है और दोषियों को सजा देने की मांग की है।

बेशक, खराब शुरुआत से खिलाड़ियों का मनोबल गिरा और देश की जग हंसाई हुई। भले ही जापान से बुरी तरह हारे लेकिन यही देश अंतत: एशिया का चैंपियन बना। दूसरी तरफ हमारी पुरुष टीम कभी भी किसी भी ऐरे-गैरे से पिट रही है। ऐसे में महिलाएं बेहतर स्थिति में हैं और उन्हें पर्याप्त अवसर मिले तो जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, चीन आदि को टक्कर दे सकती हैं। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हम नेपाल और बांग्लादेश के सामने घुटने टेक देते हैं। फिर भी महिलाओं को यदि पुरुषों की तरह एक्सपोजर और सुविधाएं मिले तो उनसे उम्मीद की जा सकती है। कुछ जानकार और नीति-निर्माता तो यहां तक कह रहे हैं कि पुरुषों की बजाय महिला फुटबॉल को प्राथमिकता दी जाए। उनकी राय में मणिपुर, मिजोरम, असम, बंगाल, हरियाणा, उड़ीसा, झारखंड, केरल, पंजाब आदि प्रदेशों की महिला खिलाड़ियों में दम हैं। जरूरत उन्हें बेहतर सुविधाएं, शिक्षण-प्रशिक्षण और आर्थिक मदद की है।

