February 14, 2026

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शारीरिक शिक्षा की आड़ में खेलों से खिलवाड़

  • तो फिर ऐसे बनेंगे खेल महाशक्ति?

राजेंद्र सजवान

देर से ही सही खेलों के ठेकेदारों को समझ आई है कि देश में खेलों के लिए माहौल बनाने के लिए ‘शारीरिक शिक्षा’ को बढ़ावा देना अति आवश्यक है। लेकिन शारीरिक शिक्षा और प्रशिक्षण का तात्पर्य सिर्फ शरीर को सजाना-संवारना, मांसपेशियां चमकाना और दौड़-भाग ही नहीं है। जरूरी यह है कि विश्व स्तर पर अग्रणी खेल राष्ट्रों को टक्कर देने और पदक जीतने के लिए खेल और खिलाड़ियों की जरूरतों के अनुरूप माहौल बनाने और उन्हें समुचित शिक्षण प्रशिक्षण देने की है। लेकिन क्या भारतीय खेलों में ऐसा कुछ हो रहा है या सिर्फ शारीरिक शिक्षा का ढोल पीटने का फर्जीवाड़ा चल रहा है? इस बारे में जब देश के चैंपियन खिलाड़ियों और नामी कोचों और वरिष्ठ फिजिकल शिक्षाविदों से पूछा गया तो अधिकतर ने निराशाजनक तर्क दिए और शारीरिक शिक्षा का हौवा खड़ा करने वालों पर पलटवार करते हुए कहा कि देश में खेल गंदी राजनीति का शिकार हो रहे हैं।

   कुछ पूर्व कोचों, जिन्होंने अनेक ओलंपिक और विश्व चैंपियन तैयार किए देश में खेलों के नाम पर चल रहे शारीरिक शिक्षा के भटकाने वाले अभियानों को जम कर कोसते हुए पूछा है कि 1. देश के लाखों सरकारी स्कूलों में खेलने के मैदान नहीं है। शौचालय तक नहीं है तो शारीरिक शिक्षा को कैसे बढ़ावा मिलेगा? 2. पढ़ाई का बोझ लगातार बढ़ रहा है तो शिक्षार्थी के लिए खेलों से जुड़ना कैसे संभव हो पाएगा? 3. अधिकतर स्कूलों में खेल शिक्षक और कॉलेजों के डीपीई और अन्य कोच जब कोई खेल नहीं खेले और सिफारिश  और गंदी राजनीति के चलते पदों पर बैठे है तो खिलाड़ियों को कैसे और क्या सिखाएंगे?

   बेशक, देश में ‘फिजिकल एजुकेशन’ एक ऐसा विषय है जो कि पूरी तरह भ्रष्टाचार और दलगत राजनीति का शिकार है। कोच और शिक्षक ऐसे है, जिन्होंने खेल मैदान के दर्शन तक नहीं किए, कोई खेल नहीं खेले l खेलों को बढ़ावा देने का नारा देने वालों से यह भी पूछा जा रहा है कि खेल शिक्षक, कोच और अन्य ट्रेनर बेरोजगारी और व्यभिचार के शिकार क्यों हैं? क्यों उन्हें मासिक वेतन और भत्ता नहीं मिल पा रहा? क्यों उनकी अनदेखी की जा रही है? उनकी नियुक्ति और पदोन्नति का पैमाना क्या है और क्या कभी सरकारों ने इस ओर ध्यान दिया है?

   कुछ पूर्व ओलंपियन कह रहे हैं कि जब तक खेल मंत्रालय और खेल प्राधिकरण देश के स्कूलों को पूरी तरह खेलों से नहीं जोड़ेंगे और शारीरिक शिक्षा की दुकान चलाने वालों पर अंकुश नहीं लगाएंगे भारत का ओलंपिक अभियान आगे नहीं बढ़ पाएगा। सिर्फ साइकिल चलाने, सड़कों पर दौड़ने और खेलो इंडिया का नारा देने से हम खेल महाशक्ति नहीं बन पाएंगे।

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