संतोष ट्रॉफी की उपेक्षा से उपजा असंतोष!
- आज भारतीय फुटबॉल वहां खड़ी है जहाँ से हर रास्ता गहरी खाई में जाता है
- पूर्व खिलाड़ियों का कहना है कि जब तक संतोष ट्रॉफी राष्ट्रीय फुटबॉल चैंपियनशिप को फिर से जिन्दा नहीं किया जाता, पहले सा सम्मान नहीं दिया जाता, भारतीय फुटबॉल का भला नहीं होने वाला
- आईएसएल और आई-लीग में भाग लेने वाले पेशेवर खिलाड़ियों और क्लबों की हालत खस्ता है और कोई हल नहीं निकल पाने के कारण लीग खतरे में पड़ गई हैं
राजेंद्र सजवान
“भारतीय फुटबॉल में जरा भी शर्म बची है तो उसके शीर्ष पदाधिकारियों और खासकर फेडरेशन अध्यक्ष कल्याण चौबे को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए”, सत्तर-अस्सी के दशक के एक पूर्व अंतर्राष्ट्रीय खिलाडी की यह झल्लाहट बताती है कि भारतीय फुटबॉल आज कहाँ खड़ी है। उधर, बंगाल के एक दिग्गज खिलाड़ी को नहीं लगता कि सिर्फ अकेले कल्याण चौबे फुटबाल की बर्बादी के जिम्मेदार हैं। उनकी राय में भारतीय फुटबॉल के पतन की शुरुआत लगभग पचास साल पहले हो गई थी लेकिन समय रहते हालात सुधारने के प्रयास नहीं किए गए। नतीजन मर्ज बढ़ता चला गया और आज देश की फुटबॉल वहां खड़ी है जहाँ से हर रास्ता गहरी खाई में जाता है।

फुटबॉल के लिए चिंतित और देश को सेवाएं देने वाले दर्जन भर पूर्व खिलाड़ियों की माने तो जब तक संतोष ट्रॉफी राष्ट्रीय फुटबॉल चैंपियनशिप को फिर से जिन्दा नहीं किया जाता, पहले सा सम्मान नहीं दिया जाता, भारतीय फुटबॉल का भला नहीं होने वाला। उनका कहना है कि संतोष ट्रॉफी भारतीय फुटबॉल का सबसे बड़ा असंतोष बनकर रह गई है। देशभर के प्रदेशों में खेलने वाले खिलाड़ियों के अनुसार आईएसएल और आई-लीग की शुरुआत जिस उदेश्य से की गई थी उसका महत्व नहीं रह गया है। इन आयोजनों के चलते संतोष ट्रॉफी तीसरे दर्जे का टूर्नामेंट बन गया है, जिसे लेकर देश भर की फुटबॉल इकाइयां, क्लब और खुद फेडरेशन गंभीर नहीं है। चूंकि संतोष ट्रॉफी का कद बहुत छोटा कर दिया गया है इसलिए विभिन्न प्रदेशों के खिलाड़ी, ठगा गया महसूस करते हैं। ऐसे खिलाड़ियों को नौकरियां भी नहीं मिल पाती। यह भी देखने में आया है कि ज्यादातर सिफारिशी खिलाड़ी राज्य टीमों में शामिल किए जाते हैं। नतीजन खेल का स्तर भी गिर रहा है। अर्थात अब संतोष ट्रॉफी भारतीय फुटबॉल में तीसरे – चौथे दर्जे का आयोजन बन कर रहा गया है।

उधर, आईएसएल और आई-लीग में भाग लेने वाले पेशेवर खिलाड़ियों और क्लबों की हालत खस्ता है। कोई हल नहीं निकल पाने के कारण लीग खतरे में पड़ गई हैं। ऐसे में एक बार फिर से संतोष ट्रॉफी को महत्व देने की मांग की जा रही है। भले ही कुछ भारतीय खिलाड़ी लाखों में खेल रहे हैं। कुछ एक को करोड़ भी मिल रहे हैं लेकिन देश की फुटबॉल में उनका योगदान जीरो रहता है। ऐसे में फुटबॉल प्रेमियों का एक बड़ा वर्ग मांग कर रहा है कि संतोष ट्रॉफी को भारतीय फुटबॉल में नंबर वन आयोजन बना दिया जाए और आईएसएल और आई-लीग जैसे बेमतलब आयोजनों को पर्याप्त जांच पड़ताल के बाद ही मुख्य धारा से जोड़ा जाए।

