ध्यानचंद की आड़ में
- तीन ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता, सर्वकालीन श्रेष्ठ खिलाड़ी और वह खिलाड़ी जिसके नाम की कसमें खाई जाती हैं उसे आज तक ‘भारत रत्न’ क्यों नहीं मिल पाया?
- यह सवाल वर्षों से पूछा जा रहा है, जिसका जवाब किसी भी सरकार, खेल मंत्रालय, हॉकी फेडरेशन और हॉकी इंडिया के पास नहीं है
- कुछ पूर्व ओलम्पिक और अन्य खिलाड़ियों का मानना है कि जिस देश में अपने चैम्पियन खिलाड़ियों की अनदेखी होती है, उसके खेल भला कैसे तरक्की कर सकते हैं और नतीजा सामने है
- हॉकी का बेताज बादशाह 45 सालों से ओलम्पिक गोल्ड नहीं जीत पाया है और विश्व विजेता बने तो 50 साल हो गए हैं
राजेंद्र सजवान
‘फिट इंडिया’, ‘हिट इंडिया’, ‘दौड़ों इंडिया’, ‘खेलो इंडिया’ ‘कूदो इंडिया’ और इस प्रकार के अनेकों संबोधन हर साल अगस्त के महीने में सुनने-सुनाने को मिल जाते हैं। इसलिए क्योंकि 29 अगस्त भारतीय हॉकी के इतिहास पुरुष मेजर ध्यानचंद का जन्मदिन है, जिसे देशवासी भले ही किसी त्योहार की तरह नहीं मनाते लेकिन सरकार, खेल मंत्रालय, कुछ खेल फेडरेशन और सरकारी टुकड़ों पर पलने वाले कुछ एनजीओ को यकायक हरकत में आ जाते हैं। कुकुरमुत्तों की तरह कुछ फर्जी और सरकार के मुंह लगे संगठन अपनी-अपनी दुकाने सजाकर मैदान में उतर जाते हैं। कोई साइकिल में बैठकर दद्दा ध्यानचंद का जन्मदिन मनाता है तो कोई मैराथन दौड़ का आयोजन करता है और कुछ एक तो बिना कुछ करे धरे मुफ्त की पब्लिसिटी और सरकारी पैसा लूट ले जाते हैं।
तीन ओलम्पिक स्वर्ण पदक विजेता, सर्वकालीन श्रेष्ठ खिलाड़ी और वह खिलाड़ी जिसके नाम की कसमें खाई जाती हैं उसे आज तक ‘भारत रत्न’ क्यों नहीं मिल पाया? यह सवाल वर्षों से पूछा जा रहा है, जिसका जवाब किसी भी सरकार, खेल मंत्रालय, हॉकी फेडरेशन और हॉकी इंडिया के पास नहीं है। एक सवाल यह भी पूछ लिया जाता है कि सचिन तेंदुलकर भारत रत्न बन सकता है तो ध्यानचंद को क्यों नहीं?
मेजर ध्यानचंद के जन्मदिवस को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनके प्रदर्शन को याद कर कसीदे पढ़े जाते हैं लेकिन सरकार, हॉकी फेडरेशन, खिलाड़ी, अधिकारी कोई भी उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न देने की बात नहीं करता। हां, उनके यशस्वी पुत्र और महानतम हॉकी खिलाड़ी अशोक ध्यानचंद कभी कभार दबी जुबान में पिता के साथ हुई नाइंसाफी की बात जरूर करते हैं।
बेशक, ध्यानचंद, रूप सिंह, बलबीर सिंह सीनियर जैसे महान खिलाड़ियों को जरूर याद किया जाना चाहिए। लेकिन सिर्फ एक दिन ही क्यों? 29 अगस्त को हॉकी, फुटबॉल, एथलेटिक्स, कुश्ती और अन्य कई खेल आयोजन होते हैं। नेता-सांसद ध्यानचंद को याद करते हैं। सभा-समारोहों में सरकार का गुणगान किया जाता है और फिर साल भर के लिए ध्यानचंद की प्रतिमा पर कोई फूल माला नहीं चढ़ाई जाती।
कुछ पूर्व ओलम्पिक और अन्य खिलाड़ियों का मानना है कि जिस देश में अपने चैम्पियन खिलाड़ियों की अनदेखी होती है, उसके खेल भला कैसे तरक्की कर सकते हैं! नतीजा सामने है। हॉकी का बेताज बादशाह 45 सालों से ओलम्पिक गोल्ड नहीं जीत पाया है। विश्व विजेता बने तो 50 साल हो गए हैं।