वॉलीबॉल चैंपियन्स लीग लौटाएगी खोया गौरव?
- अक्टूबर में शुरू होने वाली इस लीग के खोजकर्ता और सूत्रधार युवा धीरज मंजेरी और कुलवंत बाल्यान हैं
- अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों, अर्जुन और द्रोणाचार्य अवार्डियों ने देश में वॉलीबॉल की दुर्गति के लिए फेडरेशन की गंदी राजनीति को जिम्मेदार बताया
- उन्होंने उम्मीद जताई कि पेशेवर लीग के आयोजन से इस खेल को खोया स्थान पाने में मदद मिलेगी
राजेंद्र सजवान
भारतीय वॉलीबॉल की कहानी भी देश के अन्य खेलों से मिलती-जुलती है, जिनमें कुछ हल्की-फुल्की उपलब्धियां, गंदी राजनीति और अंतत: धड़ाम से गिरने का प्रकरण शामिल है। आज वॉलीबॉल कहां है बहुत कम को खबर होगी। इसलिए क्योंकि इस खेल के हत्यारे भी अन्य भारतीय खेलों से मिलते-जुलते हैं, जिन्हें फेडरेशन अधिकारी और खेल की दीमक कहा जाता है। ऐसा हमारा कहना नहीं सालों और दशकों पुराने अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी, अर्जुन और द्रोणाचार्य अवार्डी कहते हैं।

फिलहाल, लगभग गुमनामी के अंधेरे में लुप्त हो रहे गांव-देहात और शहरों की चमक-दमक में पसंद किए जाने वाले खेल के लिए खुशखबरी है। वह यह है कि देश में वॉलीबॉल को फिर से जिंदा करने के लिए कुछ युवा आगे आए हैं। वॉलीबॉल चैंपियन्स लीग (वीसीएल) की शुरुआत कर वे देश की मिट्टी और गांव-देहात के खेल को फिर से पटरी पर लाना चाहते हैं। ‘वन नेशन, वन लीग’ के नाम पर आयोजित होने वाली इस लीग के खोजकर्ता और सूत्रधार युवा धीरज मंजेरी और कुलवंत बाल्यान हैं।

राजधानी दिल्ली स्थित ऐरो सिटी में आयोजित प्रेस वार्ता में धीरज और कुलवंत ने भारतीय वॉलीबॉल की ताजा हालत पर दुख व्यक्त किया और दर्जन भर पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों और कोचों की मौजूदगी में कहा कि उनका लक्ष्य वॉलीबॉल को क्रिकेट की तरह लोकप्रिय बनाने का है। लीग के सीईओ विश्वास बंसल ने देश में एक पेशेवर लीग के आयोजन पर जोर दिया और कहा कि भारतीय वॉलीबॉल को यदि विश्व से मुकाबला करना है तो एक पेशेवर लीग की जरूरत है, जिसमें देश के जाने-माने खिलाड़ियों की भूमिका और उनकी सलाह महत्वपूर्ण होगी। उनके अनुसार लीग के लिए खिलाड़ियों के चयन की प्रक्रिया अगस्त में शुरू होगी, सितंबर में खिलाड़ियों की ऑक्शन और अक्टूबर से लीग खेली जाएगी। आदि योगी स्पोर्ट्स फाउंडेशन लीग को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभाएगा।

ऐसा माना जाता है कि भारत में वॉलीबॉल की शुरुआत 20वीं सदी की शुरुआत में हुई थी। साल दर साल रेलवे, सेना, पुलिस और शिक्षा संस्थानों में इस खेल को गंभीरता से अपनाया गया। 1951 में भारतीय वॉलीबॉल फेडरेशन अस्तित्व में आई। 1960 से 70 तक भारतीय वॉलीबॉल का स्वर्णिम काल माना जाता है। 1986 एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतने के बाद लगा कि देश में वॉलीबॉल का विकास होगा लेकिन फेडरेशन की गुटबाजी ने सब कुछ बर्बाद कर दिया।

लीग की घोषणा के अवसर पर उपस्थित रहे पूर्व खिलाड़ियों आमेर सिंह, जीई धरन, सुखपाल सिंह, सुरेश मिश्रा, संजीव सिंह, राधिका, दलेर सिंह, रणजीत सिंह और अन्य ने देश में वॉलीबॉल की दुर्गति के लिए फेडरेशन की गंदी राजनीति को जिम्मेदार बताया और उम्मीद जताई कि पेशेवर लीग के आयोजन से खेल को खोया स्थान पाने में मदद मिलेगी तो खिलाड़ियों के रोजगार फिर से बहाल हो पाएंगे।

