अंकिता ध्यानी… पहाड़ की पंगडंडी से ट्रैक पर दौड़ने का सफर
- बोलीं कि पेरिस के अनुभव का फायदा अगले ओलम्पिक में मिलेगा
अजय नैथानी
इस साल में 19 प्रतियोगिताओं में खेलने के बाद इस ओलम्पियन अंकिता ध्यानी ने हाल में संपन्न हुई वेदांता दिल्ली हाफ मैराथन में दौड़ कर अपने सीजन का समापन किया। इस तरह उनका एक लम्बा और व्यस्त सत्र समाप्त हो गया, जिसके बाद उत्तराखंड की एथलीट इन दिनों ब्रेक पर है। सेंट्रल रेलवे में कार्यरत अंकिता दिल्ली हाफ मैराथन के लिए भारत की राजधानी में थी, जहां वरिष्ठ खेल पत्रकार अजय नैथानी से साथ उत्तराखंड के किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली अंकिता की लंबी बातचीत हुई, जिसमें 3000 मीटर स्टीपलचेज और 5000 मीटर की इस धाविका ने पहाड़ों में संघर्ष भरे बचपन से लेकर भारतीय एथलेटिक्स में नई ऊंचाइयां छूने तक हर विषय पर चर्चा की।
- आप अपने दिल्ली हाफ मैराथन में दौड़ने के अनुभव को लेकर क्या कहेंगी?
दिल्ली हाफ मैराथन 2025 में दौड़ने के यह मेरा पहला अनुभव था और यहां मेरा प्रदर्शन अच्छा रहा। भले ही मैं पोडियम फिनिश नहीं कर पाई लेकिन अपने व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय (1:17:52) के साथ भारतीय महिला एलीट कैटेगरी में पांचवें स्थान पर रहीं। मेरी टाइमिंग पिछले वीडीएचएम की भारतीय एलीट विजेता लिली दास (1:18:12) से अच्छी रही। मैं 16 किलोमीटर तक अच्छा दौड़ रही थी लेकिन हाफ मैराथन की उतनी अच्छे से ट्रेनिंग नहीं की थी, इसलिए पोडियम से दूर रह गई। लेकिन कुल मिलाकर अच्छा प्रदर्शन था।

- वीडीएचएम में भारतीय खिलाड़ी विदेशियों से इतना पीछे क्यों रह जाते हैं?
हम विदेशियों की तुलना में काफी पीछे है, क्योंकि यहां दिल्ली जो भी विदेशी दौड़ने आता है, वो हाफ मैराथन की तैयारी करके आता है जबकि यह मेरा इवेंट नहीं है। अगर हम लोग भी केवल हाफ मैराथन के लिए अच्छे से तैयारी करें, तो हम विदेशी रनर्स को पकड़ सकते हैं। वैसे, अगर हमें तैयारियों के लिए एक साल का समय मिल जाए, तो हम भी अपना स्तर उठाकर उनकी बराबरी कर सकते हैं।
- आपने क्या सोचकर इस साल इतनी प्रतियोगिताओं में भाग लिया?
मेरा लक्ष्य 2025 की टोक्यो वर्ल्ड चैम्पियनशिप था और मुझे पता था कि उसमें क्वालीफाई करना मुश्किल है। लिहाजा, मैंने बेहतर रैंकिंग के जरिये आगे बढ़ने का फैसला लिया, जिसके लिए मुझे ज्यादा से ज्यादा प्रतिस्पर्धाओं में शिरकत करके अच्छा प्रदर्शन करना था। इसी कड़ी मैंने इस साल 19 कंपीटिशनों में भागीदारी कर ली, जिनमें कुछ अंतरराष्ट्रीय थीं और कुछ राष्ट्रीय थीं। अंतत: मैं रैंकिंग बेहतर करके टोक्यो में हुई वर्ल्ड एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में भाग लेने में सफल हुईं, जहां 3000 मीटर स्टीपलचेज स्पर्धा में 10 मिनट 3.22 सेकेंड समय के साथ ओवरऑल ग्यारहवें स्थान पर रही। इस दौरान मुझे विश्व रिकॉर्डधारियों एवं दिग्गज एथलीटों के साथ प्रतिस्पर्धा करने का मौका मिला और उनसे सीखने को मिला। वहां मिली सीख-सबक भविष्य में हमारे काम आएंगे।

- आगे की योजनाएं क्या हैं?
जैसा कि सबको मालूम है कि अगले साल एशियन गेम्स का आयोजन जापान के आइची और नागोया में होना है। ये प्रतियोगिता मेरे लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें अच्छा प्रदर्शन करके भारत के लिए पदक जीतने की संभावना है। इसलिए मेरा पूरा फोकस एशियन गेम्स में रहेगा। जहां तक भविष्य की योजनाओं का सवाल है तो भारत में अगर अच्छे खिलाड़ी मेरे साथ ट्रेनिंग करेंगे, तो अच्छा होगा। लेकिन यहां अच्छे खिलाड़ी कम है, जिस वजह से कंपटीशन कम रहता है। लिहाजा, मुझे ट्रेनिंग के लिए विदेश की तरफ रुख करना पड़ता है। इस साल अमेरिका में तीन महीने और बेंगलुरू के साई सेंटर में विदेशी कोच साइमन स्कॉट की देखरेख में ट्रेनिंग की और अगले साल उम्मीद है कि विदेश में ज्यादा समय के लिए मुझे भेजा जाएगा, जहां मुझे अच्छे एथलीटों के साथ प्रतिस्पर्धा व ट्रेनिंग करने का अवसर मिलेगा।
- आप भविष्य में कौन से इवेंट के साथ बने रहना चाहेंगी?
सीजन ब्रेक है, इसलिए इस बारे में सोचा नहीं है कि अगले साल 5000 मीटर भागूंगी या फिर 3000 स्टीपलचेज। इस बारे में अगले साल ही सोचूंगी। वैसे, ये दोनों इवेंट मुझे प्रिय है और मैं कोशिश करूंगी कि दोनों में भाग लेना जारी रखूं।

- आप स्टीपलचेज दौड़ने के लिए भी क्यों प्रेरित हुईं?
आपको मालूम है कि मैं लॉन्ग डिस्टेंस रनर हूं। लेकिन मैं स्टीपलचेज दौड़ने वाले एथलीटों को देखा करती थी, तो मेरे मन में इस इस इवेंट पर हाथ आजमाने की इच्छा हुई। इसके लिए मैंने अपने कोच से पूछा तो उन्होंने मुझे रोका नहीं बल्कि इसके उलट आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। इसके बाद मैंने स्टीपलचेज दौड़ना शुरू कर दिया और यह मुझे अच्छा लगने लगा। मेरा प्रदर्शन अच्छा होता गया और मेरे नाम 2000 मीटर स्टीपलचेज स्पर्धा का नेशनल रिकॉर्ड (6:13.92) है, जो अगस्त 2025 में बनाया था। 3000 मीटर स्टीपलचेज स्पर्धा में मेरा बेस्ट 9:31.99 सेकेंड समय है, जिसके दम पर मैंने जुलाई 2025 में जर्मनी में हुई एफआईएसयू वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स के दौरान इस स्पर्धा का सिल्वर मेडल जीता था। इसके अलावा मुझे इस साल अगस्त में टोक्यो हुई वर्ल्ड एथलेटिक्स चैम्पियनशिप के दौरान 3000 मीटर स्टीपलचेज में दौड़ने का मौका भी मिला, जहां मैं 10 मिनट 3.22 सेकेंड समय के साथ कुल 35वें स्थान पर रही। इस प्रतियोगिता में मुझे वर्ल्ड रैंकिंग कोटा के जरिये अंतिम समय में एंट्री मिली थी। वैसे, मैंने स्टीपलचेज दौड़ना लगभग एक साल पहले शुरू किया था।
- अगर आप धाविका नहीं होतीं, तो क्या होतीं?
अगर मैं एथलीट (धाविका) नहीं होती….तो मैं आर्मी में भर्ती हो गई होती। मेरे दौड़ने के करियर की शुरुआत हुई थी। उस समय हम लोगों का उद्देश्य सेना में भर्ती होना होता था, जिसके लिए दौड़ जरूरी थी। इस कारण मैंने दौड़ना शुरू किया और दौड़ते-दौड़ते यहां तक पहुंच गई। मैंने 2015 से दौड़ना शुरू किया लेकिन प्रॉपर ट्रेनिंग 2017 से करने लगी जब मैं होस्टल गई।

- आपके खेल जीवन का सबसे यादगार पल कौन सा है?
पेरिस ओलम्पिक 2024 मेरे खेल जीवन का सबसे यादगार पल था, जहां मैंने महिलाओं की 5000 मीटर स्पर्धा के लिए क्वालीफाई किया था, जहां मुझे वर्ल्ड रैंकिंग कोटा के जरिये अंतिम समय में एंट्री मिली थी। जब मुझे इस बारे में अंतिम समय में पता चला तो लगा कि मैं जैसे कोई सपना देख रही हूं। क्योंकि मैंने नहीं सोचा था कि मैं 2024 में ओलम्पिक खेलूंगी। तब मुझे यकीन नहीं हुआ, क्योंकि मेरा लक्ष्य 2028 के ओलम्पिक गेम्स था। मेरी तैयारी उस समय ओलम्पिक के लिए माकूल स्तर की नहीं थी लेकिन पेरिस से अनुभव से भविष्य में फायदा मिलेगा। बहरहाल, मैं ओलम्पिक में अपने प्रदर्शन औसत करार दूंगी, क्योंकि इवेंट से पहले मुझे बुखार था।
- आप उत्तराखंड से हैं, वहां खेल को लेकर हालात, सरकार और उसकी योजनाओं के बारे में क्या कहेंगी?
उत्तराखंड सरकार से मुझे काफी समर्थन मिला है। उनकी स्कीमें फायदेमंद रही है लेकिन अगर इनको और बेहतर किया जाए तो अच्छा रहेगा। राज्य सरकार से एशियन गेम्स समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय प्रतियोगिता के पदक विजेताओं को मिलने वाली प्रोत्साहन और बढ़ा दी जाए तो हम खिलाड़ियों को हौसला बढ़ेगा। हरियाणा, यूपी, हिमाचल प्रदेश जैसी कई अन्य राज्य सरकारें अपने खिलाड़ियों को काफी अच्छी प्रोत्साहन राशि देती हैं।
मुझे लगता है कि उत्तराखंड से खिलाड़ियों का पलायन तभी रुकेगा, जब राज्य सरकार ग्रामीण इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने लगेगी तो हम खिलाड़ी बाहर जाने के लिए विवश नहीं होंगे। खासतौर पर महिला खिलाड़ियों के लिए स्पोर्ट्स हॉस्टल कम स्तरीय हैं और उनकी संख्या भी कम है। इसलिए लड़कियों का खेलों में आना थोड़ा मुश्किल होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेल के मैदान (फुटबॉल, एथलेटिक्स अन्य खेलों के लिए) बन जाएं, तो अच्छा है, जिस कारण ज्यादा खिलाड़ियों, विशेषकर लड़कियों आगे आएंगी। इसके लिए खिलाड़ियों के लिए खेल कोटा की भर्ती बेहतर होनी चाहिए। हमारे राज्य में विशेषज्ञ कोचों की कमी है और ज्यादा संख्या में विशेषज्ञ कोच मिल जाए तो अधिक खिलाड़ी राज्य व देश का नाम रोशन करेंगी।

- एथलेटिक्स में पहाड़ी होने का क्या फायदा मिला?
जैसा कि आप जानते हैं कि मैं पौड़ी गढ़वाल जिले के जहरीखाल ब्लॉक स्थित मरोड़ा गांव के उत्तराखंडी किसान परिवार से हूं। मेरे पिता किसान है और मां गृहणी है। जब मैंने गेम्स शुरू किया था तो पहाड़ी होने का फायदा मुझे मिला था। लगभग 1400 मीटर के हाईल्टीट्यूड में रहने और भाग-दौड़ करने के कारण मेरा स्टैमिना और एंड्यूरेंस अच्छा था इसलिए कोई भी लक्ष्य या वर्कआउट मिलता था तो मैं उसे अच्छे से कर लेती थी।
