ऐसे होगा फुटबॉल का कल्याण
कल्याण सर
सादर नमस्कार
ऐसा नहीं है कि आपके फेडरेशन (एआईएफएफ) अध्यक्ष बनने के बाद भारतीय फुटबॉल का पतन हुआ है। यह सिलसिला लगभग पचास साल पहले शुरू हो गया था और दिन पर दिन, साल दर साल हमारी फुटबॉल की हवा निकलती चली गई। दासमुंशी, प्रफुल्ल पटेल और अब आप स्वयं इस गिरावट के गवाह रहे हैं। हैरानी वाली बात यह है कि कमी कहां है, इस पर ध्यान देने की बजाय किसी ने भी भारतीय फुटबॉल की असल बीमारी को पकड़ने, परखने की बजाय सिर्फ और सिर्फ बयानबाजी पर जोर दिया और अपनी विफलताओं को दूसरे के सिर मढ़ने का रास्ता चुना।

क्योंकि आप स्वयं अच्छे खिलाड़ी रहे हैं इसलिए पिछले अध्यक्षों की असफलताओं से सबक लेकर अपनी फुटबॉल का दर्द दूर करने की आप से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा की गई थी। क्योंकि आप देश की सरकार के करीबी है इसलिए ज्यादा की उम्मीद की गई लेकिन आज तक शायद आप खुद भी अपनी फुटबॉल का दर्द, खामी, बीमारी और शर्मनाक प्रदर्शन की पीड़ा को समझ नहीं पाए हैं। बुरा ना माने तो आपको एक सलाह देना चाहता हूं कि आप खिलाड़ी की तरह देश की फुटबॉल को समझने और तमाम खामियों को दूर करने का प्रयास करें और कुछ समय के लिए अपने अंदर के नेता को एक तरफ रखकर सोंचें तो खुद-ब-खुद हल निकल आएगा।
आप देख रहे हैं कि हमारी पुरुष टीम निरंतर पिछड़ती जा रही है तो लड़कियां भी कोई बड़ा करिश्मा नहीं कर पाई हैं। हां, यदि कोई खिलाड़ी बेहतर कर पाए तो उसे आसमान पर चढ़ा देते हैं और खराब प्रदर्शन पर बहानेबाजी शुरू हो जाती है। कुल मिलाकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और 150 करोड़ की आबादी वाले देश की फुटबॉल सबसे बड़े और लोकप्रिय खेल में भारत महान को बार-बार लज्जित करती आ रही है।

कल्याण सर अपने 40 साल की खेल पत्रकारिता में रहने और बतौर पूर्व फुटबॉलर मैंने पाया कि फुटबॉल देश का मान-सम्मान गिराने वाले खेलों की सूची में नंबर एक पर है। एक बार गिरावट का जो क्रम शुरू हुआ है अब तक थमा नहीं पा रहा है। ओलंपिक और विश्व कप खेलने का सपना तक नहीं देख सकते हैं। दो बार एशिया का चैंपियन देश भाग तक नहीं ले पा रहा है।
यदि आप इजाजत दें तो कुछ सलाह देना चाहता हूं:-
- स्कूल और छोटे आयु वर्ग पर गंभीरता से ध्यान दें।
- उम्र की धोखाधड़ी को रोकें।
- ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन और उसकी इकाइयों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करें।
- संतोष ट्रॉफी के महत्व को समझें।
- सट्टेबाजी और फिक्सिंग से गंभीरता व कठोरता के साथ निपटें।
- पूर्व खिलाड़ियों और कोचों को सम्मान दें और उनकी सेवाएं लें।
- सिर्फ आईएसएल और आई-लीग से काम नहीं चलने वाला। सभी राज्यों में वार्षिक लीग का आयोजन कराएं, आदि-आदि।
आपका व फुटबॉल का शुभचिंतक
राजेंद्र सजवान
(लेखक 40 सालों से खेल पत्रकार है और राष्ट्रीय स्तर का फुटबॉल रहा है)
