… और भारत ने फीफा वर्ल्ड कप जीत लिया!
- ‘भारत कब फीफा वर्ल्ड कप जीतेगा?’ नामक एक सेमिनार में बहुत कुछ कहा बोला सुना गया, नतीजतन खोदा पहाड़ और चूहा भी नहीं निकला
- कुछ पूर्व फुटबॉलरों, जानकारों, खेल की आड़ में दुकान चलाने वालों और देश के कुछ एक्सपर्टस ने अपनी राय व्यक्त की
- एक अधिकारी द्वारा भारतीय मूल के फुटबॉलरों को देश के लिए खेलने का निमंत्रण देने को लेकर खूब तालियां बजी, चूंकि श्रीमान जी रसूकदार थे इसलिए उनके कथन को पत्थर की लकीर मान लिया गया
- फुटबॉल को बढ़ावा देने के नाम पर देश में इस प्रकार के बकवास प्रोग्राम रोज ही कहीं ना कहीं होते हैं और एआईएफएफ, उसकी राज्य इकाइयां, चंद स्कूल, कॉलेज, कुछ फुटबॉल अकादमियां भी जब तब देश की फुटबॉल को सुधारने का नारा बुलंद करती हैं
- खिलाड़ियों को खूब ज्ञान पिलाया जाता है, माँ-बाप को फुटबॉल से प्यार करने की सीख दी जाती है लेकिन कुछ दिन बाद पता चलता है कि क्रिकेट मैदान को अपनी कर्मभूमि बना लेता है
- घंटे, दिन और महीने बीत जाते हैं लेकिन वह क्रिकेट की एबीसी भी नहीं सीख पाता लिहाजा पढ़ाई-लिखाई चौपट हो जाती है, वो लग और अंततः एक अच्छी कद काठी का बच्चा फुटबॉलर बनते-बनते बस मज़ाक बन जाता है
- यही सब देश में हो रहा है, क्योंकि बचपन से प्रतिभाओं की पहचान का कल्चर हमने अपनाया नहीं
- भारतीय फुटबॉल की जड़ों को कीड़ा लगा है इसलिए शुरुआत ‘दवा दारू‘ से की जाए तो बेहतर होगा
- फुटबॉल फेडरेशन, उसकी राज्य इकाइयों, आईएसएल, संतोष ट्रॉफी और तमाम आयु वर्ग के आयोजनों में सुधार की जरूरत है
राजेंद्र सजवान
हाल ही में एक सेमिनार में भाग लेने का अवसर मिला। विषय था ‘भारत कब फीफा वर्ल्ड कप जीतेगा?’ बेशक़ शीर्षक भारी भरकम था क्योंकि जो देश फुटबॉल विश्व कप में भाग लेने के काबिल नहीं बन पाया, जिस देश में फुटबॉल की हैसियत लगातार गिर रही है और जिस देश ने ऊपर चढ़ने की बजाय नीचे लुढ़कने की राह चुनी हो उसके फीफा वर्ल्ड कप खेलने की बात करना भी मज़ाक लगता है। क्योंकि कुछ बोलना था, अपनी राय व्यक्त करनी थीं इसलिए कुछ पूर्व खिलाड़ियों, फुटबॉल जानकारों, फुटबॉल की आड़ में दुकान चलाने वालों और देश के कुछ एक्सपर्टस ने बहुत कुछ कहा सुना। अंततः एक अधिकारी द्वारा भारतीय मूल के विदेशी खिलाड़ियों को भारत के लिए खेलने का निमंत्रण देने को लेकर खूब तालियां बजाई गईं। चूंकि श्रीमान जी रसूकदार थे इसलिए उनके कथन को पत्थर की लकीर मान लिया गया। तालियों की गड़गड़ाहट के बाद चाय-समोसे के साथ सेमिनार कहे जाने वाला कार्यक्रम निपट गया। अर्थात खोदा पहाड़ और चूहा भी नहीं निकला।

फुटबॉल को बढ़ावा देने के नाम पर देश में इस प्रकार के बकवास प्रोग्राम रोज ही कहीं न कहीं होते हैं। भारतीय फुटबॉल फेडरेडन (एआईएफएफ), उसकी राज्य इकाइयां, चंद स्कूल, कॉलेज, कुछ फुटबॉल अकादमियां भी जब तब देश की फुटबॉल को सुधारने का नारा बुलंद करती हैं। खिलाड़ियों को खूब ज्ञान पिलाया जाता है, माँ-बाप को फुटबॉल से प्यार करने की सीख दी जाती है। लेकिन कुछ दिन बाद पता चलता है कि बेटा गेंद-बल्ला लेकर क्रिकेट मैदान को अपनी कर्मभूमि बना लेता है। देखते ही देखते फुटबॉल का सपना देखने वाले बच्चों की लंबी कतार क्रिकेट मैदान की तरफ कूच कर जाती है। इसके साथ ही माँ-बाप के सपने और बच्चे की इच्छाशक्ति कुंद पड़ जाते हैं। इसलिए क्योंकि हजारों लाखों बर्बाद करने के बाद भी उसे बल्लेबाजी और गेंदबाजी करने का सुअवसर नहीं मिल पाता। घंटे, दिन और महीने बीत जाते हैं, लेकिन वह क्रिकेट की एबीसी भी नहीं सीख पाता। पढ़ाई-लिखाई चौपट हो जाती है, वो लग। क्रिकेट का बुखार उतरते-उतरते सालों लग जाते हैं। अंततः एक अच्छी कद-काठी का बच्चा फुटबॉलर बनते-बनते बस मज़ाक बन जाता है।

बेशक, यही सब देश में हो रहा है। बचपन से प्रतिभाओं की पहचान का कल्चर हमने अपनाया नहीं। स्कूल, अकादमियों और कोचिंग सेंटर में खिलाड़ी बनने का पाठ तो पढ़ाया जाता है लेकिन अच्छा फुटबॉलर या क्रिकेटर कौन बन सकता है? अच्छे एथलीटों और जिम्नास्टों में क्या गुण होने चाहिए, जैसी महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता। चूंकि विषय फुटबॉल है और फीफा वर्ल्ड कप में भारतीय भागीदारी को लेकर चिंतन मनन किया जा रहा है इसलिए अंततः यही कहा जा सकता है कि भारतीय फुटबॉल के ठेकेदारों, शीर्ष पदाधिकारियों, अकादमियां चलाने वालों और फुटबॉल की आड़ में गोरखधंधा करने वालों की नीयत में खोट है। कुछ सालों के लिए दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल में ईमानदारी से योगदान देने की जरूरत है और छलावा, दिखावा और धोखाधड़ी पर अंकुश लगा तो एक दिन हम अवश्य फीफा वर्ल्ड कप खेल पाएंगे। जीतने के बारे में सोचना पाप नहीं है, लेकिन हमने तो अभी ठीक से चलना भी नहीं सीखा है। पिछले सौ सालों में हमारी फुटबॉल फीफा कप के काफी नज़दीक पहुँचने के बाद तेजी से लुढ़की और आज जीरो की तरह बस गोल मटोल रह गई है।

क्योंकि भारतीय फुटबॉल की जड़ों को कीड़ा लगा है इसलिए शुरुआत ‘दवा दारू’ से की जाए तो बेहतर होगा। फुटबॉल फेडरेशन, उसकी राज्य इकाइयों, आईएसएल, संतोष ट्रॉफी और तमाम आयु वर्ग के आयोजनों में सुधार की जरूरत है। वरना फीफा कप खेलने का सपना कभी पूरा नहीं होने वाला।
