क्यों खेल पत्रकारिता फेल पत्रकारिता बन गई है?
- उम्र के फर्जीवाड़े और डोपिंग में नंबर एक पर हैं लेकिन हमारी मीडिया कभी इस बारे में क्यों नहीं लिखता-बोलता? इसलिए क्योंकि ज्यादातर प्रकाशन, पत्र और पत्रकार अपने पसंदीदा नेताओं की गोद में बैठे हुए हैं
- विनेश फोगाट और महिला पहलवानों के साथ जो कुछ घटित हुआ पूरी दुनिया जानती है कि दोषी कौन है और किसे बचाया जा रहा है लेकिन पता होने के बावजूद देश का मीडिया कानों में सीमेंट का लेप किए हुए है
- इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात है तो उसको कभी भी विश्वसनीय नहीं माना जा सकता, क्योंकि ऐसे मीडिया का चरित्र ही चारण भाटों की पद्धति पर टिका है
- सरकारों से उम्मीद ना कभी थी और अब तो सब कुछ ढह गया है, क्योंकि पत्रकारिता की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता से जुड़े वैश्विक सूचकांक में भारत महान 160वें स्थान के आस-पास है
राजेंद्र सजवान
पिछले कुछ सालों में भारतीय खेल पत्रकारिता (प्रिंट) की जो दुर्दशा हुई है, उसको देखते हुए भारतीय खेलों का भविष्य धर में नज़र आता है। जहां तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात है तो उसको कभी भी विश्वसनीय नहीं माना जा सकता, क्योंकि ऐसे मीडिया का चरित्र ही चारण भाटों की पद्धति पर टिका है। नेताओं की चाकरी, आम जनमानस की भावनाओं की अनदेखी और अपराधियों को शरण और संरक्षण देना देश के ज्यादातर आम और खास टीवी चैनलों का गोरखधंधा बन गया है लेकिन प्रिंट मीडिया जब खेल प्रमुखों, खेल के धंधेबाजों और दुष्चरित्र खेल नेताओं की गोद में बैठ जाता है तो यह तस्वीर बेहद भयावह नजर आती है।
देश खेल महाशक्ति बनने की दिशा में बढ़ रहा है। कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद ओलंपिक गेम्स की मेजबानी का इरादा रखता है और चौथी-पांचवीं अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है लेकिन युवा पीढ़ी और खिलाड़ियों को देश के पास एक भी ओलंपिक चैंपियन नहीं है। हम खेलों में महाफिसड्डी हैं। उम्र के फर्जीवाड़े और डोपिंग में नंबर एक पर हैं लेकिन हमारी मीडिया कभी इस बारे में क्यों नहीं लिखता-बोलता? इसलिए क्योंकि ज्यादातर प्रकाशन, पत्र और पत्रकार अपने पसंदीदा नेताओं की गोद में बैठे हुए हैं। खेलों का मतलब उनके लिए बस क्रिकेट है।
विनेश फोगाट और महिला पहलवानों के साथ जो कुछ घटित हुआ पूरी दुनिया जानती है। दोषी कौन है और किसे बचाया जा रहा है यह भी मीडिया को पता है। लेकिन देश का मीडिया कानों में सीमेंट का लेप किए हुए है। सरकारों से उम्मीद ना कभी थी और अब तो सब कुछ ढह गया है, क्योंकि पत्रकारिता की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता से जुड़े वैश्विक सूचकांक में भारत महान 160वें स्थान के आस-पास है।

कुछ पूर्व पत्रकारों और दबंग लेखकों के अनुसार – भले ही सरकार की नीयत साफ हो और खिलाड़ियों की परवाह की जा रही हो लेकिन महिला खिलाड़ियों का सरेआम शोषण करने वालों के हौसले इसलिए बुलंद हैं, क्योंकि मीडिया का एक छोटा सा वर्ग भ्रष्टाचारियों, बलात्कारियों और अवसरवादियों को पनाह दे रहा है। हैरानी वाली बात यह है कि जब कोई पत्रकार बलात्कारियों, उम्र की धोखाधड़ी करने वालों और खिलाड़ियों का अहित करने वालों पर सवाल दागता है तो मीडिया का ‘एक’ वर्ग अपने आकाओं को बचाने में जुट जाता है। सच्चे, ईमानदार और खिलाड़ियों की भावनाओं को समझने वाले पत्रकारों की हंसी उड़ाई जाती है। हालांकि ऐसे क्रान्तिकारियों की संख्या नगण्य रह गई है।
जैसा कि खेल मंत्रालय भी मानता है कि देश के अधिकांश खेलों में महिला खिलाड़ियों, महिला कोचों और खेल संघ की महिला सदस्यों एवम पदाधिकारियों को कदम कदम पर असामाजिक ताकतों का सामना करना पड़ता है। लेकिन कितने अपराधियों पर कार्रवाई हो पाती है, शायद ही किसी के पास जवाब होगा। इसलिए अपराधियों पर एक्शन नहीं हो पाता क्योंकि मीडिया का बड़ा वर्ग मौन है। उसके हाथ काट लिए गए हैं। फेडरेशन के शीर्ष पदों पर बैठे लोग किस कदर निरंकुश हैं, क्यों उन्हें किसी का डर नहीं है हाल के घटनाक्रम से पता चल जाता है।
कुश्ती फेडरेशन अकेला नहीं है जिस पर महिला खिलाड़ियों ने आरोप लगाए हों। यदि गंभीरता से जांच की जाए तो जूडो, कराटे, तायक्वाडो और तमाम मार्शल आर्ट्स खेलों में जंगल राज चल रहा है। हॉकी, फुटबाल, हैंडबॉल, बास्केटबॉल एथलेटिक, तैराकी, जिम्नास्टिक और अन्य खेलों में कई छेड़-छाड़ और भ्रष्टाचार के मामले जब तब प्रकाश में आते और जाते रहे हैं। लेकिन दो-चार दिन के शोर शराबे के बाद सबकुछ मौन हो जाता है। इसलिए क्योंकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मीडिया के पास समय नहीं है या उसके शीर्ष अधिकारियों के हाथ बंधे हुए हैं। विनेश फोगाट प्रकरण के बाद यह साफ हो गया है कि मीडिया के हाथ बाँध दिए गए हैं। उसे खुलकर लिखने, विचार व्यक्त करने और दूध का दूध करने की आजादी नहीं है।
हां, यह जरूर देखने में आया है कि क्रिकेट पर बड़े बड़े भाषण, व्याख्यान, बयान छपने-छापने की खुली छूट है। बाकी खेलों की गंभीर ख़बरों को इसलिए भी दरकिनार कर दिया जाता है क्योंकि मीडिया को क्रिकेट भाता है। ऐसा नहीं है कि बाकी खेल मीडिया की प्राथमिकता में शामिल नहीं हैं। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि कुछ पत्रकार अपने करीबियों को अपने पेशे से भी ऊपर आंकते हैं। उनकी हाँ में हाँ मिलाते हैं और मौका मिला तो साथी पत्रकारों से नजरें बचाकर उनके पांव छूने का मौका नहीं चूकते। ऐसे ही मीडिया के कारण खेल पत्रकारिता महज तमाशा बन कर रह गई है, जिसका सीधा असर देश के खेलों पर पड़ रहा हैl सच तो यह है कि मीडिया पर से खेल और खिलाड़ियों का विश्वास उठ चुका है।
