“मुझे टीम दो, मैं फीफा वर्ल्ड कप दूंगा”
- मिनर्वा फुटबॉल अकादमी के निदेशक और सर्वेसर्वा रणजीत बजाज ने अंडर 15 टीम सौंपने और बदले में फीफा वर्ल्ड कप देने की गुहार लगाई है
- क्योंकि भारतीय फुटबॉल का हाल किसी से छिपा नहीं है जो कि हर मोर्चे पर नाकाम होकर लगभग टूट चुकी है और सालों बाद भी भारतीय फुटबॉल फीफा विश्व कप के आस-पास भी नहीं पहुंच पा रही
- वह कल्याण चौबे से जैसे भीख मांग रहे हैं तो उनके भरोसे की दाद तो देनी चाहिए, क्योंकि उन्हें फीफा कप जीतने का भरोसा है, यह जानते हुए कि विश्व फुटबॉल में भारत की कोई औकात नहीं है
- रणजीत के क्लब मिनर्वा ने कुछ सप्ताह पहले हेल्सिंकी कप में खिताब जीता था, और उस दौरान नामी क्लब लीवरपूल को बुरी तरह हराया
राजेंद्र सजवान
“तुम मुझे टीम दो, मैं तुम्हें ट्रॉफी दूंगा,” यह नारा सुना सुनाया सा लगता है और आजकल खूब गूँज रहा हैl ठीक वैसे ही जैसे कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने गुलाम भारतवासियों को प्रेरित किया था, “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।” भारत तो आज़ाद हो गया लेकिन भारतीय फुटबॉल का हाल किसी से छिपा नहीं है। हर मोर्चे पर नाकाम फुटबॉल की हिम्मत लगभग टूट चुकी है। सालों बाद भी भारतीय फुटबॉल फीफा विश्व कप के आस-पास भी नहीं पहुंच पा रही है। नतीजन फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ), फुटबॉल प्रेमियों और टीम प्रबंधन ने हार मान ली है। कहीं कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। लेकिन हाल ही में मिनर्वा फुटबॉल अकादमी के निदेशक और सर्वेसर्वा रणजीत बजाज ने गुहार लगाई है, “अंडर 15 टीम को मुझे दे दिया जाए। बदले में मैं देश को वर्ल्ड कप जीतकर दिखाऊंगा।” बेशक, बजाज के आत्मविश्वास की दाद देनी होगी। कोई है जो देश की बर्बाद फुटबॉल को सजाने-संवारने का दमखम रखता है। यह जानते हुए भी कि भारतीय फुटबॉल की जड़ें दीमक लगने से खोखली हो चुकी हैं। रणजीत के आत्मविश्वास की दाद देनी होगी वह मरी गिरी फुटबाल में प्राण फूंकने का जज्बा रखते हैं।

अर्जेंटीना, ब्राजील, जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, नीदरलैंड आदि देशों के खिलाड़ियों की श्रेष्ठता के चलते रणजीत दावा कर रहे हैं, गिड़गिड़ा रहे हैं, कल्याण चौबे से जैसे भीख मांग रहे हैं तो उनके भरोसे की दाद तो देनी चाहिए। उन्हें फीफा कप जीतने का भरोसा है। यह जानते हुए कि विश्व फुटबॉल में भारत की कोई औकात नहीं है, ज्यादातर फुटबाल जानकार रणजीत को बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं ले रहे।

मिनर्वा के लिए दांव खेलने वाले रणजीत कहते हैं कि कुछ सप्ताह पहले उनके क्लब ने हेल्सिंकी कप में खिताब जीता था, नामी क्लब लीवर पूल को बुरी तरह हराया। यही कारण है कि रणजीत का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। रणजीत के बारे में कहा जाता है कि उन्हें फुटबॉल की गहरी सनक है, जिसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। ठीक वही जैसे उन्होंने अपनी टीम के लिए अपनी पत्नी के गहने तक बेच डाले थे। वही रंजीत अब भारत को विश्व विजेता बनाने का सपना संजो चुके हैं। बस एक मौका चाहिए। उन्हें अंडर 15 की राष्ट्रीय टीम दी जाए तो वे अपने खिलाड़ियों के दम पर भारतीय फुटबॉल का नया इतिहास रच सकते हैं। तो फिर एआईएफएफ को आपत्ति क्यों? क्यों नहीं एक और दांव खेला जाए? कल्याण चौबे चाहें तो एक राय से रणजीत को टीम सौंप सकते हैं। जब भारतीय फुटबॉल हर मोर्चे पर फेल हो चुकी है, हवा निकाल गई है तो एक जुआ और खेला जाए। रणजीत की कोचिंग और टीम की ताकत का इम्तिहान भी हो जाएगा।

वैसे भी भारतीय फुटबॉल पिछले पचास सालों से लगातार गिर रही है। फेडरेशन अधिकारियों के भ्रष्टाचार से देश में खेल का माहौल बिगड़ चुका है। लेकिन यदि रणजीत डंके की चोट पर अंडर 15 टीम को विश्व विजेता बनाने का दम भर रहे हैं, भारतीय फुटबॉल को ऊँचाइयाँ देने का आत्मविश्वास रखते हैं तो क्यों न उन्हें टीम सौंप दी जाए? पता चल जाएगा कि उनके पास कौन सी जादू की छड़ी है! सोशल मीडिया पर रणजीत चीख चिल्ला रहे हैं हाथ जोड़ रहे हैं तो यह मान लेना चाहिए कि उनके हाथ कुछ खास लग गया है। यदि संभव हो तो सारे नियम कानून ताक पर रखकर उन पर भरोसा किया जाना चाहिए। वरना यह तय समझें कि भारत को फीफा कप में खेलने में कई पीढ़ियाँ निकल जाएंगी। आपकी राय, क्या रणजीत भारतीय फुटबॉल का भाग्य बदल सकते हैं?
