वर्ल्ड कप का जुनून और हमारी फुटबॉल का मातम
- भारतीय फुटबॉल अपनी अंतर्कलह से जूझ रही है, क्योंकि सवाल फुटबॉल प्रेमियों को चुभ रहे हैं कि कल्याण चौबे रहेंगे या जाएंगे, या पटेल कोई जुगाड़ लगा पाएंगे या बाईचुंग फिर चुनाव लड़ेंगे?
राजेंद्र सजवान
इसे विडंबना कहें, लाचारगी कहें या निकम्मापन, उस समय जब पूरी दुनिया पर फीफा वर्ल्ड कप 2026 का बुखार चढ़ चुका है, रफ्तार पकड़ चुका है, भारतीय फुटबॉल अपने निकम्मेपन के कारण अंतर्कलह से पार पाने का रास्ता खोज रही है लेकिन कहीं कोई राह नजर नहीं आती। वही घिसी-पिटी कोशिश जारी है। हैरानी वाली यह है कि विश्व कप का बिगुल बज चुका है लेकिन अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ), देश के खेल मंत्री, उनका मंत्रालय और कुछ फ्लॉप चेहरे भारत को फुटबॉल में चैंपियन बनाने की तजवीज खोज रहे हैं।

फिलहाल उस चेहरे की बात कर लें, जिस पर आरोप है कि उनसे ओझाओं और झाड़-फूंक करने वालों पर फेडरेशन का लाखों रुपया खर्च किया। यह महाशय पूर्व एआईएफएफ अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल हैं, जो कि फेडरेशन को अलविदा कहने के बाद फिर से फुटबॉल में जुगाड़ खोज रहे हैं। सीधा सा मतलब है कि फेडरेशन अध्यक्ष कल्याण चौबे पर से मंत्रालय और फुटबॉल पंडितों का विश्वास खत्म हो चुका है। हालांकि फिलहाल कुछ भी कहना ठीक नहीं होगा लेकिन दो बार चुनाव हारने वाले चौबे देश की ताकतवर पार्टी के लाडले हैं। हालांकि उन्होंने फेडरेशन चुनाव में अध्यक्ष के दावेदार नामी खिलाड़ी बाईचुंग भूटिया को 33-1 से हराया था।
उस समय जब पूरी दुनिया फुटबॉल विश्व कप के मैचों का आनंद उठा रही है, ब्राजील, पुर्तगाल, फ्रांस, इंग्लैंड, अर्जेंटीना, स्पेन आदि देशों की जीत की संभावनाएं खोजी जा रही हैं, अनुमान लगाए जा रहे हैं, भारतीय फुटबॉल अपनी अंतर्कलह से जूझ रही है। कल्याण चौबे रहेंगे या जाएंगे? पटेल कोई जुगाड़ लगा पाएंगे या बाईचुंग फिर चुनाव लड़ेंगे, जैसे सवाल फुटबॉल प्रेमियों को चुभ रहे हैं।

खबर है कि ताजा घटनाक्रम के कारण आईएसएल और आई लीग क्लबों की नाराजगी बढ़ गई है। खासकर, कल्याण चौबे को बार-बार अभयदान देने को फुटबॉल के साथ विश्वासघात माना जा रहा है। यह सब फर्जीवाड़ा उस वक्त शुरू हुआ है जब पूरी दुनिया विश्व कप के उन्माद में डूबी है। अर्थात् फुटबॉल और आईएसएल को बचाने के लिए गलत वक्त चुना गया। लेकिन भारतीय फुटबॉल के लिए गलत या सही वक्त कोई मायने नहीं रखता। भारतीय फुटबॉल के आका जानते हैं कि उनके नाकारापन को बर्दाश्त करने की देश के फुटबॉल प्रेमियों को आदत पड़ गई है। फुटबॉल बची नहीं और विरोध करने वाले फिलहाल वर्ल्ड कप के जुनून में डूब चुके हैं। ऐसे में विरोधी स्वर खुद ब खुद दब जाएंगे।
