….तब तक वर्ल्ड कप नहीं खेल सकते!
- हम दुनिया के 48 प्रमुख फुटबॉल राष्ट्रों पर खूब बतिया रहे हैं, ज्ञान झाड़ रहे हैं और कौन जीतेगा इस विषय पर भी पूरे तथ्यों के साथ बहस में भाग लेते हैं और अंततः थक हार कर पूछते हैं, “यार भारत कब वर्ल्ड कप खेलेगा?”
- ऐसा तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक भारतीय फुटबॉल को संचालित करने वाली AIFF सुधर नहीं जाती, जब तक उसके पदाधिकारी ईमानदार प्रयास नहीं करते
- भारतीय फुटबॉल का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि पिछले कुछ सालों में जितने भी प्रयास हुए खेल स्तर इसलिए नहीं सुधरा क्योंकि फेडरेशन अधिकारियों, राज्य इकाइयों, यूनिवर्सिटी और स्कूल फुटबॉल और अन्य सभी जिम्मेदार लोगों की नीयत में खोट था
- फेडरेशन अधिकारियों, स्व. प्रिय रंजन दासमुंशी, प्रफुल्ल पटेल और अब कल्याण चौबे ने अपने कार्यकाल में भारतीय फुटबॉल प्रेमियों को हसीन सपने दिखाए लेकिन भारतीय फीफा रैकिंग गिरती चली गई
राजेंद्र सजवान
जैसे-जैसे वर्ल्ड कप 2026 आगे बढ़ रहा है, दुनियाभर में सिर्फ और सिर्फ फुटबॉल की चर्चा हो रही है। यहाँ तक कि अमेरिका-ईरान युद्ध भी जैसे ठिठक गया है। चार साल से भाग दौड़, आपा-धापी, प्रदूषण और गंदी राजनीति को झेल रहे अपने देश के आम नागरिक और फुटबॉल प्रेमी भी बिलों से बाहर निकल गए हैं। दुनिया के 48 प्रमुख फुटबाल राष्ट्रों पर खूब बतिया रहे हैं, ज्ञान झाड़ रहे हैं। कौन जीतेगा इस विषय पर भी पूरे तथ्यों के साथ बहस में भाग लेते हैं और अंततः थक हार कर पूछते हैं, “यार भारत कब वर्ल्ड कप खेलेगा?”

बेशक़, सवाल तो वाजिब है। आखिर भारत को क्यों फीफा वर्ल्ड कप में नहीं होना चाहिए? दुनिया के कई देश ऐसे हैं जिनकी आबादी भारत के किसी जिले और छोटे से राज्य जितनी है लेकिन उनके खिलाड़ी वर्ल्ड कप में तहलका मचा रहे हैं। कुछ ऐसे भी देश हैं जो कि गरीबी और शिक्षा के मामले में भारत से बहुत पीछे हैं लेकिन फीफा कप में उठा पटक करते आए हैं। लेकिन भारत क्यों नहीं खेलता? हो सकता है बहुत से लोगों को यह पता नहीं कि वर्ल्ड कप खेलने के लिए लम्बा और दुर्गम रास्ता तय करना पड़ता है। क्वालिफाइंग दौर से गुजरना पड़ता है और महाद्वीप में श्रेष्ठ देशों को वर्ल्ड कप का टिकट मिल पाता है। दुर्भाग्यवश भारत जो कि कभी श्रेष्ठ था अब फिसड्डियों की जमात में पहुँच गया है।
अर्थात भारतीय फुटबॉल को फिर से जीरो से शुरुआत करनी होगी। पहले अड़ोस-पड़ोस के फिसड्डियों से पार पाना होगा। तत्पश्चात महाद्वीप के पांच-छह अव्वल देशों से निपटना पड़ेगा और इस प्रकार वर्ल्ड कप की राह आसान हो जाएगी। लेकिन ऐसा तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक भारतीय फुटबॉल को संचालित करने वाली AIFF सुधर नहीं जाती, जब तक उसके पदाधिकारी ईमानदार प्रयास नहीं करते। देश में आयोजित होने वाली ISL, I League और संतोष ट्रॉफी राष्ट्रीय चैंपियनशिप का आयोजन ईमानदारी से नहीं होता। लेकिन सबसे पहले स्कूल स्तर की फुटबॉल को सुधारने का प्रयास किया जाए। साथ ही छोटी आयुवर्ग के आयोजनों को गंभीरता से लेना जरूरी है।

भारतीय फुटबॉल का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि पिछले कुछ सालों में जितने भी प्रयास हुए खेल स्तर इसलिए नहीं सुधरा क्योंकि फेडरेशन अधिकारियों, राज्य इकाइयों, यूनिवर्सिटी और स्कूल फुटबॉल और अन्य सभी जिम्मेदार लोगों की नीयत में खोट था। फेडरेशन अधिकारियों, स्व. प्रिय रंजन दासमुंशी, प्रफुल्ल पटेल और अब कल्याण चौबे ने अपने कार्यकाल में भारतीय फुटबॉल प्रेमियों को हसीन सपने दिखाए लेकिन भारतीय फीफा रैकिंग गिरती चली गई। इतनी गहराई तक गिरी है कि वहां से लौट पाना आसान नहीं होगा। सवाल सिर्फ खेल का स्तर गिरने का नहीं है गांव, नगर, महाँनगर जिला और राज्य स्तर पर अधिकारियों का चरित्र भी बुरी तरह गिरा है। इस गिरावट ने देश की फुटबाल को अस्त व्यस्त कर दिया है। नतीजन अब राज्य और राष्ट्रीय स्तर की फुटबॉल को सट्टेबाज और फ़िक्सर चला रहे हैं। अर्थात एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा। स्कूल, कॉलेज और क्लब स्तरीय फुटबॉल के आयोजन भी अब अपराध जगत के हाथों पड़ गए हैं। ऐसे में जब तक तमाम अनियमितताओं और खिलाड़ियों के चयन के फ़र्ज़ीवाड़े पर नकेल नहीं डाली जाती देश की फुटबॉल का सुधरना मुश्किल है। लेकिन भैंस के आगे बीन बजाने का कोई फायदा नहीं। अपने देश में फुटबॉल का जोश बस एक-दो महीने चलेगा और फिर चार साल बाद पूछेंगे, भारत क्यों वर्ल्ड कप में नहीं खेल रहा?
