कब बनेगी कोक्रोच खेल बचाओ, देश बचाओ पार्टी?
- कुछ पूर्व खिलाड़ियों ने उम्मीद जतलाई कि खेलों में भी ऐसी किसी पार्टी के दखल की अपेक्षा की जा रही है
राजेंद्र सजवान
कोक्रोच जनता पार्टी बन गई है। मीडिया में पार्टी के गठन और उसके क्रिया कलापों को लेकर बहुत कुछ कहा सुना जा रहा है। देश के बहुत से खिलाड़ी पूछ रहे हैं की क्या यह पार्टी भारतीय खिलाड़ियों की दयनीय हालत को लेकर भी कुछ करेगी या यूँ ही सोशल मीडिया पर हुड़दंग मचा कर मौन हो जाएगी या मौन कर दी जाएगी। कुछ पूर्व खिलाड़ियों ने इस पत्रकार से अपनी और भावी पीढ़ी की समस्याओं के बारे में बहुत कुछ कहा और उम्मीद जतलाई कि खेलों में भी ऐसी किसी पार्टी के दखल की अपेक्षा की जा रही है। किसी बड़ी खिलाड़ी क्रांति को समस्या का हल माना जा रहा है। इसलिए क्योंकि देश के खेल आका, साई, खेल संघ और कोच देश के खेलों को दीमक की तरह चाट रहे हैं जिससे छुटकारा पाने के लिए कोक्रोच खेल पार्टी की जरुरत महसूस की जा रही है।

बेशक़, तमाम भारतीय खेलों को दीमक चाट चुकी है। दवा-दारू, फ्लिट, टिक-ट्वेंटी और तमाम प्रयोग करने के बाद भी दीमक है कि जाती नहीं। दूसरी तरफ निराश हताश कोक्रोचों के झुण्ड बढ़ते-बढ़ते विशाल काय हो रहे है। बेशक़, मामला गंभीर है इसलिए हताश और निराश खिलाड़ियों को कोक्रोच कहना ठीक नहीं होगा लेकिन क्यों पढ़े लिखे और खेल में पारंगत खिलाड़ी बेरोजगार हैं और क्यों उनकी संख्या लाखों करोड़ों तक पहुँच गई है? दूसरी बड़ी चिंता इसबात की है कि हमारे कोक्रोच घातक दवाएं खाने पीने के लिए बाध्य हैं और वाडा नाडा द्वारा पकड़े जाने पर देश का नाम खराब कर रहे हैं? तीसरी और बड़ी मुसीबत यह है कि व्यवस्था को चौपट करने के बाद भी कोक्रोच की उम्र घटते क्रम में बढ़ रही है। अर्थात 15, 17, 19 और 21 साल के आयु वर्ग में 2-4 साल बड़े कोक्रोच आसानी से खोजे जा सकते हैं।

जहाँ तक बेरोजगार कोक्रोच की बात है तो लाखों और शायद करोड़ों खिलाड़ी बेरोजगार हैं। हालांकि सरकार और राज्य सरकारें खिलाड़ियों को नौकरी देने के दावे करते हैं लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि लाखों में से एक-दो को ही नौकरी मिल पाती है। यहाँ तक आरोप लगाए जा रहे हैं कि चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के लिए 20 से तीस लाख रुपये का चढ़ावा चढ़ाना पड़ता हैं। पढ़े-लिखे खिलाड़ी बेरोजगार भी बढ़ते बढ़ते लाखों में पहुँच गए हैं, जिन्हें खेल कोटे की नौकरी का धोखा बर्बाद कर रहा है।

भले ही देश की सरकारों ने फिलहाल खिलाड़ियों की बेरोजगारी को गंभीरता से नहीं लिया है लेकिन वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब खिलाड़ी कोक्रोच लाखों करोड़ों की तादात में सड़कों और गली कूचों में हुड़दंग मचाने और व्यवस्था को कुतरने के लिए विवश हो जाएंगे।
