गुटबाज डीएसए पतन की ओर, खलनायक बने सीनियर खिलाड़ी!
- पिछले कुछ महीनों में पनपा विवाद बेहद ख़तरनाक मोड़ पर पहुँच गया है और अब कोर्ट में खेल होने के आसार हैं
- डीएसए की गुटबाजी, सदस्यों का दो–तीन धड़ों में बंटना, अपनी अपनी डफली बजाना और खेल की बजाय अपने हितों को प्रमुखता देना फसाद की सबसे बड़ी जड़ है
- जिन वरिष्ठ पदाधिकारियों, क्लब प्रमुखों और पूर्व खिलाड़ियों पर मार्ग दर्शक के रूप में फुटबॉल का विश्वास टिका था, उनमें से कुछ एक ने दिल्ली की फुटबाल को डुबोने में बड़ी भूमिका निभाई है
- हालात पिछली सदी के उस दौर में जैसे गए है जब दिल्ली फुटबॉल एसोसिएशन की गुटबाजी चरम पर थी और दोनों गुट अपनी अलग लीग और अन्य आयोजन करने पर उतारू थे
राजेंद्र सजवान
राजधानी दिल्ली की फुटबॉल आज जिस मोड़ पर खड़ी है – या पड़ी है वहां से बाहर निकलने और आगे बढ़ने के रास्ते ना सिर्फ बंद हैं बल्कि कहा यह भी जा रहा है कि पिछले कुछ महीनों में पनपा विवाद बेहद ख़तरनाक मोड़ पर पहुँच गया है और तुरंत फुरत में यदि कोई उपाय नहीं खोजा गया या एकराय नहीं बनाई गई तो भारतीय फुटबॉल के फीफा नक़्शे से गायब होने से पहले देश की राजधानी की फुटबॉल में सब कुछ बर्बाद हो सकता है l
बेशक़, डीएसए की गुटबाजी, सदस्यों का दो-तीन धड़ों में बंटना, अपनी अपनी डफली बजाना और खेल की बजाय अपने हितों को प्रमुखता देना फसाद की सबसे बड़ी जड़ है l सत्ता लोलुपता के चलते बड़े छोटे सभी क्लब कुछ ऐसे लोगों के हाथों का खिलौना बन गए हैं जिनका मकसद खेल और खिलाड़ियों की बजाय अपने स्वार्थों की पूर्ति करना रहा है। किसी क्लब, पदाधिकारी और खिलाड़ी के नाम का उल्लेख किए बिना यह पत्रकार पिछली सदी के उस दौर में पहुँच गया है जब दिल्ली फुटबॉल एसोसिएशन की गुटबाजी चरम पर थी और दोनों गुट अपनी अलग लीग और अन्य आयोजन करने पर उतारू थे। लेकिन आज हालात बद से बदतर हो गए हैं l तथाकथित सट्टेबाज, फिक्सर, टीम चयन में धांधली करने वाले और मिली भगत के बदनाम फरिश्ते अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं और किसी भी कीमत पर फुटबाल की वापसी नहीं चाहते।

हैरानी वाली बात यह है कि जिन वरिष्ठ पदाधिकारियों, क्लब प्रमुखों और पूर्व खिलाड़ियों पर फुटबाल का विश्वास टिका था, जिन्हें मार्ग दर्शक के रूप में जाना-पहचाना जाता रहा और जिनको जूनियर क्लब अधिकारी और खिलाड़ी हमेशा सम्मान की नज़र से देखते रहे उनमें से कुछ एक ने दिल्ली की फुटबॉल को डुबोने में बड़ी भूमिका निभाई है। उनके नामों का उल्लेख करना फुटबाल के प्रति अन्याय होगा लेकिन यह कटु सत्य है कि उन आधादर्ज़न अवसरवदियों में से कोई भी बड़ा और सम्मानजनक फुटबालर नहीं रहा। पूर्व खिलाड़ियों के अनुसार पाला बदलने में माहिर, गुटबाज, चालबाज और मौकापरस्तों में ज्यादातर ऐसे हैं जिन्हें अपने बाद की पीढ़ी को अच्छे संस्कार और मार्ग दर्शन देना चाहिए था l लेकिन उन्होंने दिया कोर्ट का दरवाजा और टूटी बिखरी पंचर फुटबॉल।
यदि दिल्ली की फुटबॉल को अब भी समझ नहीं आई, सकुनी, विभीषणों और मोहम्मद गौरी जैसे हथकंडे अपनाने बंद नहीं किए तो दिल्ली से एक लोकप्रिय और सर्वप्रिय खेल का जनाजा उठना तय समझें।
