…क्योंकि ओलंपिक गली-कूचे के खेल नहीं!
- भारत 2036 की ओलंपिक मेजबानी के लिए ताल ठोक चुका है
- सवाल यह है कि क्या हम खेलों के महाकुंभ में पदक जीतने के लिए तैयार है
- हमारे पास कितने खिलाड़ी हैं, जो पदक जीतने के दावेदार है या क्षमता रखते हैं
राजेंद्र सजवान
हम 2036 की ओलंपिक मेजबानी के लिए ताल ठोक चुके हैं। लेकिन ये मुकाबला खेल मुकाबलों से भी ज्यादा कड़ा है क्योंकि जर्मनी, हंगरी, कतर, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया और तुर्कीया जैसे मज़बूत खेल राष्ट्र भी कड़ी चुनौती लिए मैदान में उतर चुके हैं। बेशक़ हम कुछ भी कर गुजरने का दमखम रखते हैं लेकिन ओलंपिक खेल कोई गली-कूचे का आयोजन नहीं है। साधन सुविधाओं के आलावा बड़े और विहंगम स्टेडियम, भव्य खेल मैदान, होटल, दमदार ट्रांसपोर्ट व्यवस्था, मजबूत सड़कें और अंततः चैंपियन खिलाड़ियों की फ़ौज हमारी बड़ी जरूरतों में रहेंगी। हो सकता है कि गुजरात इस कसौटी पर खरा उतरे लेकिन यह भी देखना होगा कि हमारे खिलाड़ी कितने खेलों में पदक जीतने के दावेदार हैं या तब तक कितने नाम अग्रिम पंक्ति में दर्ज हो जाएंगे।
चलिए हम अरबों रुपये खर्च करने की हैसियत रखते हैं। खेलों में हमारा रुझान भी बढ़ रहा है। तारीफ की बात यह है कि वक्त की नज़ाकत को देखते हुए सरकार ने खेल बजट भी दोगुना चौगुना और सौगुना कर दिया है। इस सब के बाद सवाल यह पैदा होता कि देश के पास पदक विजेता खिलाड़ी कितने हैं और 2036 तक हम कितने ओलंपिक चैंपियन पैदा कर पाएंगे? सवाल कड़वे जरूर हैं लेकिन आयोजन क्षमता के साथ-साथ मैदान में उतरने वाले खिलाड़ियों को भी तलाशना तराशना होगा। तो फिर कितना तैयार है भारत? या यूँ ही सुर्रे छोड़े जा रहे हैं?

हाल ही में संपन्न हुए एशियाई खेलों के नतीजों पर सरसरी नज़र डालें तो हम बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं। खासकर एथलेटिक, तैराकी और जिम्नास्टिक में फिलहाल एक भी खिलाड़ी ओलंपिक पदक के आस पास वाला नज़र नहीं आ रहा। जिन खिलाड़ियों ने एशियाड में पदक लूटे हैं उनमें से कुछ एक एथलीट, तीरन्दाज, निशानेबाज, मुक्केबाज, पहलवान, हॉकी खिलाड़ी और कुछ अन्य पदक के दावेदार हो सकते हैं। लेकिन जिन खिलाड़ियों के एशियाड प्रदर्शन पर हम फुले नहीं समा पा रहे उनके लिए खेल महाकुम्भ में टिक पाना और पदक पाना कदापि आसान नहीं होगा।
सही मायने में हमें यदि 2036 की मेजबानी चाहिए तो अन्य प्रतिद्वन्द्वी देशों की दावेदारी को छोटा साबित करना होगा। ऐसा प्रदर्शन के लिहाज से तो संभव नहीं है क्योंकि हमारे पास किसी भी खेल का दूसरा लाइनअप नहीं है। मान लें कि हमें मेजबानी मिल जाती है तो इसके बाद खिलाड़ियों की तलाश भी करनी होगी जो कि अगले दस साल तक अपने खेल के शिखर पर रहेंगे। अर्थात चुनौतियाँ कई हैं जिनसे निपटने के लिए आज और अभी से प्रयास करने होंगे। लेकिन यह तय है कि यदि अन्य बातों के साथ साथ आयोजन का दावा करने वाले देशों का रिपोर्ट कार्ड चेक किया जाता है तो भारत सातवां और अंतिम दावेदार होगा। इसलिए क्योंकि हम अपने मुंह मियां मिट्ठू हैं।

