भारत कैसे बनेगा खेल महाशक्ति, यही है यक्ष प्रश्न
- दिल्ली में ‘विजन 2036: पॉवरिंग इंडियाज राइस एस ए ग्लोबल स्पोर्टिंग सुपरपॉवर’ विषय को लेकर स्पोर्ट्स इंडिया कॉन्फ्रेंस 2026 में हुआ मंथन
- पेफी के चेयरमैन डॉ. एके उप्पल ने तुलनात्मक राय रखते हुए खेल महाशक्ति चीन और भारत के बीच का अंतर बताया
- डॉ. एके उप्पल के अनुसार, “हमें ओलम्पिक खेलों में टॉप 15 में आना चाहिए, लेकिन मेरे हिसाब से यह बहुत मुश्किल काम है और इसके लिए हमें स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर क्रांति की जरूरत है
अजय नैथानी
चीन हमसे आगे क्यों है? वो कैसे खेल महाशक्ति बन गया? हमारे पड़ोसी के भारत से आगे निकलने की वजह क्या है? या फिर कहें कि हम बतौर खेल राष्ट्र पिछड़ क्यों रहे हैं, क्योंकि हमारी गिनती ओलंपिक जैसे शीर्ष अंतरराष्ट्रीय स्तरीय प्रतियोगिता में फिसड्डियों के बीच होती है, जहां हम केवल अपनी उपस्थिति दर्ज करवा पाते हैं। ये ऐसे कुछ सवाल हैं, जो हर भारतीय खेल प्रेमी को चुभते हैं लेकिन इसका कोई समाधान देश और उसकी सरकारें आज तक नहीं ढूंढ पाईं जबकि उसके उलट हम विजन ओलम्पिक 2036 की मेजबान और पदकों की भरमार का सपना देख रहे हैं। बहरहाल, राजधानी दिल्ली स्थित भारत मंडपम में ‘विजन 2036: पॉवरिंग इंडियाज राइस एस ए ग्लोबल स्पोर्टिंग सुपरपॉवर’ विषय को लेकर स्पोर्ट्स इंडिया कॉन्फ्रेंस 2026 का आयोजन किया गया और इस दौरान पेफी के चेयरमैन डॉ. एके उप्पल ने 2036 के मद्देनजर देश में खेलों पर अपनी तुलनात्मक राय रखी, जिसका समर्थन द्रोणाचार्य महासिंह राव, पैरा-शूटिंग कोच सुभाष राणा समेत अन्य पैनलिस्टों ने किया।

- चीन की तरह पूल का पिरामिड बनाने की जरूरत
एक खेल महाशक्ति के तौर पर भारत विजन ओलम्पिक 2036 की ओर कैसे बढ़ेगा? इस सवाल पर डॉ. एके उप्पल ने कहा, “अगर हमें खेल महाशक्ति के तौर पर खुद को स्थापित करना है तो चीन से सीखना होगा। वैसे, जब मैं चीन की बात करता हूं, तो बहुत से लोग नाराज हो जाते हैं।” वह दोनों पड़ोसियों के बीच तुलना करते हुए आगे कहते हैं, “चीन का ओलम्पिक आंदोलन 1984 में शुरू और हमारी 1900 में। लेकिन आज देखिये चीन ओलम्पिक में दुनिया के शीर्ष तीन देशों में रहता है जबकि हम वहां से कोसों दूर हें। चीन ने ओलम्पिक में उतरने से पहले ही अपनी तैयारियां शुरू कर दी थीं जबकि हमारे यहां उस तरह के प्रयास नहीं हुए। भारत खेल प्राधिकरण (साई) ने साल 1985 में नेशनल स्पोर्ट्स टैलेंट कॉन्टेस्ट (एनएसटीसी) शुरू किया और इसमें छोटी उम्र के 250 खिलाड़ी (आठ से 14 साल) चुने गए, जिनमें से बहुत कम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमके। वहीं, दूसरी तरफ, चीन एक पिरामिड पर काम करता हूं। वहां सबसे निचली परत में नौ करोड़ बच्चों का चयन होता है, उसके ऊपर नौ लाख बच्चे और फिर नौ हजार बच्चे ऊपर जाते हैं। सबसे आखिर में उनमें से 12 खिलाड़ियों की टीम चुनी जाती है।”

- ओलम्पिक में शीर्ष 15 में आना मुश्किल
पेफी के चेयरमैन डॉ. एके उप्पल के अनुसार, “हमें ओलम्पिक खेलों में टॉप 15 में आना चाहिए, लेकिन मेरे हिसाब से यह बहुत मुश्किल काम है। इसके लिए हमें क्रांति की जरूरत है। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों के स्तर पर मजबूत योजना की जरूरत है। इसके अलावा उम्र की धोखाधड़ी और डोपिंग से बचने की जरूरत है।”
- फर्जी फिजिकल एजुकेशन कॉलेजों की भरमार
डॉ. एके उप्पल अपने एक अनुभव का उल्लेख करते हुए कहते हैं, “हमें शारीरिक शिक्षा को मजबूत करने की जरूरत है। इस समय देश में 7000 फिजिकल एजुकेशन कॉलेज हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर फर्जी या फिर केवल कागजों में मौजूद हैं। एक बार मैं पेफी की ओर से सरकारी सर्वे पर मध्यप्रदेश गया था। इसके तहत मैं एक फीजिकल एजुकेशन कॉलेज का सर्वे कर रहा था। मुझे भोपाल से एक गाड़ी से जाया गया, जो खेतों के बीच से होते हुए एक पंप-हाउस के पास रुकी, जिस पर कॉलेज का बोर्ड लगा था। जब मैंने स्विमिंग पूल और अन्य सुविधाओं के बारे में सवाल किया, तो उसके डायरेक्टर ने बताया कि उस खेत पर स्विमिंग पूल, दूसरे खेत पर फुटबॉल ग्राउंड और अगले खेत पर हॉकी का मैदान बनेगा। इसके बाद मैंने कॉलेज की नेगेटिव रिपोर्ट भेजी, लेकिन बाद में किसी दूसरे से सर्वे करा लिया गया और मेरी रिपोर्ट हटा दी गई और दूसरी रिपोर्ट के आधार पर कॉलेज को मान्यता दे दी गई।”

- ओलम्पिक 2036 को लेकर अभी कुछ नहीं कहा सकता है
उन्होंने आगे कहा, “ओलम्पिक 2036 की तैयारियों के बारे में अभी से कुछ नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि जो खिलाड़ी उसमें भाग लेंगे, वे या तो स्कूल जाने वाले होंगे या फिर शुरू कर रहे होंगे। उनको उस समय कैसी सुविधाएं मिलती है, कैसी कोचिंग मिलती है, कैसा ढांचा मिलता है और कैसा समर्थन मिलता, कह नहीं सकते। लेकिन अगर ओलम्पिक 2036 विजन के तहत भारत को एक ग्लोबल स्पोर्ट्स सुपरपावर के तौर पर आगे बढ़ाना है, तो हमें एक मजबूत सिस्टम की जरूरत है, जिसमें ग्रासरूट पर काम करने और ढांचागत सुविधाओं की जरूरत हैं। इसके लिए हमें ईमानदारी से काम करना होगा।”

वरिष्ठ पत्रकार
