सुब्रतो फुटबॉल: कहाँ है सरकारी स्कूलों की फुटबॉल?
- दिल्ली के एमसीडी स्कूलों के हजारों छात्र-छात्राएं की मौजूदगी क्या आयोजन महज खानापूरी था?
- फाइनल के दौरान आकर्षण का केंद्र रहे इन हजारों छात्र-छात्राओं की बुलंद आवाज़ से डॉ. बीआर अम्बेडकर स्टेडियम घंटो गूँजता रहा
- देश के अधिकतर पूर्व फुटबॉलर सरकारी स्कूलों की देन रहे हैं, जबकि आज सरकारी स्कूलों से तमाम खेल गायब हो रहे हैं
- सेना, नौसेना और वायु सेना के अपने स्कूल भी अच्छे और स्तरीय फुटबॉलर क्यों पैदा नहीं कर पा रहे?
- क्या कभी सुब्रतो कप के आयोजकों ने इस ओर ध्यान दिया है?
राजेंद्र सजवान
सुब्रतो मुखर्जी फुटबॉल टूर्नामेंट का अंडर-17 ख़िताब CISCE स्कूल (मिनर्वा अकादमी) ने जीत लिया है। विजेता टीम ने केरल के MIC स्कूल को कड़े मुकाबले में 3-2 से हराकर विजयश्री का वरण किया। लेकिन डॉ. बीआर अम्बेडकर स्टेडियम मैदान पर खेले गए फाइनल में आकर्षण का केंद्र रहे दिल्ली के एमसीडी स्कूलों के हजारों छात्र-छात्राएं जिनकी बुलंद आवाज़ से अम्बेडकर स्टेडियम घंटो गूँजता रहा। भले ही दो पेशेवर स्कूली टीमों के बीच खेला गया मैच रोमांचक रहा लेकिन आकर्षण के केंद्र में लगभग 15 हजार स्कूली बच्चे रहे, जिन्हें फुटबॉल का ज्ञान भले ही नहीं था लेकिन स्कूल प्रशासन के दबाव के चलते उन्हें सुब्रतो कप 2026 का फाइनल देखना पड़ा। भले ही उन्होंने जमकर लुत्फ उठाया लेकिन बचपन के साथ जैसा अमानवीय व्यवहार हुआ उसकी चर्चा फुटबॉल मैच से कुछ ज्यादा ही हुई l भारतीय वायुसेना की देख-रेख में आयोजित होने वाले देश के बेहतरीनतम स्कूली टूर्नामेंट में सरकारी (एमसीडी) स्कूलों के नन्हें छात्र-छात्राओं के साथ जो मज़ाक हुआ उसे देख कर यह तो साफ हो गया कि 21वीं सदी का भारत किस दिशा में जा रहा है। दो इंग्लिश मीडियम स्कूलों के खिलाड़ी मैदान में थे और गरीब, झोपड़पट्टी के बच्चों को तालियां बजाने और शोर मचाने का जिम्मा सौंप गया था, जिसका निर्वाह उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ किया।

पिछले कई सालों से दिल्ली और देश की फुटबॉल की दुर्गति के चलते राजधानी का अम्बेडकर स्टेडियम प्राय खाली पड़ा रहता है। पिछले बीस सालों में शायद ही कभी सौ दर्शक भी दर्शक दीर्घाओं में नज़र आए हों लेकिन सुब्रतो कप 2026 का फाइनल मुकाबला रिकॉर्ड उपस्थिति में खेला गया। भले ही स्टेडियम की दर्शक क्षमता 15-16 हज़ार है लेकिन क्षमता से कहीं ज्यादा बच्चे स्टेडियम में मौज़ूद थे। आयोजकों की आवाज़ पर आवाज़ मिलाकर छात्र दर्शकों ने खेल का खूब लुत्फ उठाया। बेशक़, उनमें से 90 फीसदी ऐसे थे जिन्होंने कभी फुटबॉल या कोई खेल शायद ही खेला हो। हालांकि कई हज़ार एमसीडी स्कूली छात्र-छात्राओं के बीच एयर फ़ोर्स स्कूल के दो सौ के लगभग छात्र भी स्टेडियम में मौज़ूद थे। जन गण मन से पहले वन्दे मातरम भी गाया गया लेकिन असली मज़ा तब आया जब खिलाड़ियों के हर मूव पर नन्हें मुन्ने बच्चों ने तालियां बजा कर 60-70 के दशक की याद ताज़ा कार दी। संभवतया उनके शोर को कई किलोमीटर दूर तक सुना गया होगा।

लेकिन एक सवाल हर एक की जुबान पर था कि सुब्रतो कप टूर्नामेंट सोसाइटी ने एमसीडी के 8-10 साल के बच्चों को ही क्यों चुना। उनके पास जल, थल और वायु सेना के स्कूल भी हैं। उनको भी तालियां बजाने के लिए बुलाया जा सकता था लेकिन इसलिए नहीं बुलाया गया क्योंकि उनके माता-पिता और स्कूल शायद ही अनुमति देते, जबकि सरकारी स्कूलों के बच्चों और उनके माता-पिता को आसानी से समझाया जा सकता है, उन पर दबाव बनाया जा सकता था।
बेशक़, गरीब मासूमों के चेहरे खिले हुए थे। उन्होंने फुटबॉल से ज्यादा चर्चा आयोजकों द्वारा दी गई रिफ्रेशमेंट के बारे में की। सभी खुश नज़र आए लेकिन उनके शिक्षकों को इस बात की शिकायत रही कि हजारों छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के लिए एक साफ सुथरा शौचालय तक नहीं था। कुछ शिक्षकों से बातचीत से पता चला कि उनके स्कूलों में खेलने के मैदान और शौचालय नहीं हैं। उन्हें ऊपर से आदेश मिले, जिसका पालन करना पड़ा। मैच समाप्ति के बाद बहुत से शिक्षक और ड्राइवर बच्चों की खोज बीन करते और आयोजकों को कोसते देखे गए।

हैरानी वाली बात यह है कि देश के अधिकतर पूर्व फुटबॉलर सरकारी स्कूलों की देन रहे हैं, जबकि आज सरकारी स्कूलों से तमाम खेल गायब हो रहे हैं। सेना, नौसेना और वायु सेना के अपने स्कूल भी अच्छे और स्तरीय फुटबॉलर क्यों पैदा नहीं कर पा रहे? क्या कभी सुब्रतो कप के आयोजकों ने इस ओर ध्यान दिया है?
