भारतीय खेलों का सच: सत्य निकेतन के झूठ जैसा!
- सरकार, खेल मंत्रालय, आईओए और खेल संघ के भारत के खेल महाशक्ति बनने की दिशा में तेज कदम बढ़ाने के दावों में दम नहीं है क्योंकि जिस बुनियाद पर भारतीय खेल टिके हैं उसके बेसमेंट में उम्र की धोखाधड़ी और डोप का तामझाम भरा है
राजेंद्र सजवान
“देश भर में इमारतें ढह रही हैं। आंधी, तूफ़ान और बाढ़ में हजारों-लाखों मर-खप रहे हैं। हर गांव शहर बस बर्बाद होने के लिए आतुर है। ऐसा लगता है जैसे पूरा देश भ्रष्ट तंत्र की गिरफ्त में है। खेलों पर भी भ्र्ष्टाचार और व्यविचार हावी है और देश का खिलाड़ी बस मूक दर्शक बन कर सब कुछ चुपचाप देख रहा है, सह रहा है। देश और खेल को चलाने वाली सरकारें खिलाडियों को बेवकूफ बना रही हैं, उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। वरना क्या कारण है कि 150 करोड़ की आबादी वाला देश एक ओलंपिक चैंपियन भी पैदा नहीं कर पा रहा। साफ है कि भारतीय खेल ढांचा उस बिल्डिंग की तरह खड़ा है, जो कि सत्यनिकेतन के झूठ पर टिकी थी, जिसने निर्दोष मां-बाप और छात्रों के सपनों को क़ब्रगाह में बदल दिया,” देश के कुछ पूर्व खिलाड़ियों और खेल प्रशिक्षकों का ऐसा मानना है। उन्हें लगता है कि भारतीय खेलों का भविष्य भी खंडहर इमारतों की तरह अनिश्चित है और कभी भी पूरा तामझाम किसी जर्जर इमारत की तरह ढह सकता है और लगातार ढह रहा है।

सरकार, खेल मंत्रालय, आईओए और खेल संघ दावा कर रहे हैं कि भारत खेल महाशक्ति बनने की दिशा में तेज कदम बढ़ा रहा है। लेकिन इन दावों में इसलिए दम नहीं क्योंकि जिस बुनियाद पर भारतीय खेल टिके हैं उसके बेसमेंट में उम्र की धोखाधड़ी और डोप का तामझाम भरा है। यही कारण है कि हमारे खेल बचपन में ही बर्बाद हो रहे हैं। नतीजन दिल्ली और देश भर में गिरती बिखरती इमारतों की तरह भारतीय खेल टूट बिखर रहे हैं। क्योंकि बुनियाद भ्र्ष्टाचार पर टिकी है इसलिए आम भारतीय खिलाड़ी छोटी उम्र में भटक जाता है या खेल से नाता तोड़ लेता है। एक सर्वे से पता चला है कि देश के हजारों लाखों खिलाड़ी इसलिए खेल मैदान छोड़ देते हैं क्योंकि वे खेलों में व्याप्त गंदी राजनीति और धोखाधड़ी से हार जाते हैं।

हाल ही में कुछ सब-जूनियर और जूनियर टीमों के गठन पर नाराजगी व्यक्त करने वाले खिलाड़ियों की शिकायतों पर गौर करें तो सभी खेल उम्र की धोखाधड़ी के शिकार हैं, जिसका असर प्रतिभाओं पर पड़ रहा है। नालायक और अवसरवादी खिलाड़ी दो-चार साल उम्र घटाकर असली प्रतिभाओं को आगे नहीं बढ़ने देते। उनका दमख़म जवाब देने लगता है तो इंजेक्शन और दवा दारू का सहारा लेते हैं। यही कारण है कि भारत महान खेल भ्रष्टाचार और नशाखोरी में नंबर एक पर है। दूसरी तरफ कई प्रतिभावान खिलाड़ी हतोत्साहित होकर, तंग आ कर खेल से नाता तोड़ लेते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि सत्यनिकेतन का झूठ हजारों लाखों छात्र छात्राओं को डराने भगाने लगा है।
