May 16, 2026

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सरकारी उदासीनता का नतीजा है बदहाल खेल

राजेंद्र सजवान

हाल ही में 100 मीटर फर्राटा दौड़ी की विजेता और एशियाई पदक विजेता तेलंगाना की नित्या गांधे ने राज्य सरकार की खेल नीति पर सवाल खड़े करते हुए उस सच्चाई को उजागर किया है, जिस पर टिप्पणी करने से भी देश के एथलीट और तमाम खिलाड़ी घबराते हैं। नित्या ने एक राष्ट्रीय दैनिक को दिए साक्षात्कार में कहा कि राज्य सरकार की तरफ से दी जाने वाली सुविधाएं नाकाफी हैं। खिलाड़ियों को तब पहचाना जाता है जब वह अपने दम पर कोई बड़ी उपलब्धि पर लेता है। वरना उसके प्रशिक्षण और फिटनेस जैसे महत्वपूर्ण मामलों की सरासर अनदेखी की जाती है।

   हालांकि नित्या उभरती एथलीट है और उसे शायद इस कदर खुलकर राय व्यक्त नहीं करनी चाहिए थी। बस चुपचाप सहकर अपना सफर जारी रखना चाहिए था। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि देश के खेल आका, फेडरेशन अधिकारी, साई और खेल मंत्रालय में ऐसे निष्ठुर और गैर जिम्मेदार लोग बैठे हैं, जिन्हें खेल और खिलाड़ियों की पीड़ा की जरा भी फिक्र नहीं है।

   बेशक, किसी खिलाड़ी को तब पहचाना जाता है जब वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा करिश्मा कर गुजरता है। ऐसा सिर्फ एथलेटिक्स में नहीं है। पीटी उषा से लेकर नीरज चोपड़ा ही नहीं, मिल्खा, अशोक ध्यानचंद, अजितपाल सिंह, असलम शेर खान, पीके बनर्जी, सतपाल, करतार, मास्टर चंदगीराम, विजेद्र सिंह, सुशील, योगेश्वर, और दर्जनों अन्य चैंपियनों ने जब तब अपनी राय व्यक्त करते हुए माना कि कोई बड़ी उपलब्धि पाने पर ही उन पर साधन, सुविधा और धनवर्षा होती है। यदि छोटी उम्र में ही खिलाड़ी की प्रतिभा को पहचाना जाए और राज्य एवं राष्ट्रीय सरकार प्रतिभाओं के संरक्षण, सुविधा और उनके प्रशिक्षण का बीड़ा उठा लें तो देश में पदक विजेताओं की कतारें लग जाएं। लेकिन एशियाड और ओलंपिक पदक जीतने के बाद खिलाड़ी को सिर माथे पर बैठाया जाता है। उसे तमाम सुविधाएं दी जाती हैं, जो कि वक्त गुजर जाने के बाद की खानापूरी है।   

   पूर्व चैंपियनों का मानना है कि एथलेटिक्स, तैराकी, जिम्नास्टिक्स, हॉकी, फुटबॉल, तीरंदाजी, निशानेबाजी, मुक्केबाजी और तमाम खेलों के खिलाड़ियों को यदि 5-7 साल से सरकार गोद ले, शिक्षण-प्रशिक्षण की जिम्मेदारी उठाए तो भारत में खेलों का स्तर सुधर सकता है।

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