गंदी राजनीति और कमजोर खेलनीति से डूबा पाकिस्तान!
राजेंद्र सजवान
खेल जगत में कभी पाकिस्तान का भी नाम-सम्मान हुआ करता था। खासकर स्क्वैश, क्रिकेट, हॉकी, कुश्ती और मुक्केबाजी में उसे एक ताकत के रूप में देखा जाता था। एथलेटिक्स में भी पाकिस्तान खाली हाथ लौटने वाला देश नहीं था। लेकिन 2026 के एशियाई खेलों ने पाकिस्तान की खेल तस्वीर का आईना दिखा दिया है, पूरी पोल खोल दी है।
3 अक्टूबर तक पाकिस्तान के खाते में दस पदक हैं और एक भी स्वर्ण नहीं। वो दो रजत और आठ कांस्य के साथ तालिका में 29वें पायदान पर है। यह स्थिति उस देश के लिए निश्चित रूप से गंभीर सवाल खड़े करती है, जिसने कभी एशिया के खेल नक्शे पर अपनी अलग पहचान बनाई थी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान के साथ ऐसा क्या हुआ? क्यों उसका खेल ग्राफ लगातार गिरता चला गया है? क्यों उसके अपने देश वासी, मीडिया और आम खेल प्रेमी हैरान परेशान हैं और क्यों अपने खेल तंत्र को कोस रहे हैं?

बेशक़, समस्या की जड़ में पाकिस्तान की गंदी राजनीति और दम तोड़ती खेल नीति है, जिसे लेकर आम देशवासी हमलावर हैंl बेशक़, समस्या की जड़ में खिलाड़ियों की प्रतिभा से ज्यादा दोष खेल व्यवस्था का है। खेल संघों की राजनीति, संसाधनों की कमी, आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं का अभाव और निरंतर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की कमी ने पाकिस्तान के कई पारंपरिक खेलों को पीछे धकेल दिया है। बेशक़, सबसे बड़ा कारण भारत के साथ खेलों के बीच पड़ी दरार भी है, जिसकी भरपाई होना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
पाकिस्तान की खेल पहचान का सबसे चमकदार अध्याय हॉकी रहा है। कभी ओलंपिक और विश्व हॉकी में पाकिस्तान का नाम भारत, नीदरलैंड्स, ऑस्ट्रेलिया जैसी बड़ी ताकतों के साथ लिया जाता था। लेकिन आज कोई भी मरी गिरी टीम उसे पटखनी दे रही है। एक बड़ा कारण यह भी है कि क्रिकेट ने बाकी खेलों को निगल लिया है। देश की खेल व्यवस्था का बड़ा हिस्सा क्रिकेट के इर्द-गिर्द घूम रहा है और हॉकी, एथलेटिक्स, कुश्ती, मुक्केबाजी, स्क्वैश तथा दूसरे खेल बहुत पीछे छूट गए हैं।

जब किसी देश के खेल लगातार पिछड़ रहे हैं, पिट रहे हैं तो सवाल खिलाड़ियों से पहले खेल मंत्रालय, राष्ट्रीय खेल संघों, प्रशिक्षण व्यवस्था और उन लोगों से पूछा जाना चाहिए जो वर्षों से खेल प्रशासन चला रहे हैं। खिलाड़ी मैदान में हारता है, लेकिन खेल व्यवस्था मैदान के बाहर हारने से पाकिस्तान खेल जगत में अपना मान सम्मान खो रहा है। आज उसे भारत का अनुसरण करने की जरूरत है। भले ही भारत भी कोई बड़ी खेल महाशक्ति नहीं बन पाया है।
