फुटबॉल दिल्ली: बदलाव या बर्बादी?
- डीएसए की चुनाव देश की फुटबॉल को संचालित करने वाली एआईएफएफ के नियमानुसार 30 अगस्त को होंगे
- हेमचंद, धर्मवीर और नागेंद्र सिंह जैसे अनुभवी और 70 पार के अधिकारियों को चुनाव का जिम्मा सौपा गया हैं
- लेकिन आशंका इस बात की हैं कि जो सदस्य (क्लब) या उनके प्रतिनिधि आम सभा में उपस्थित नहीं हो पाए उनकी नीयत में खोट ना हो
- हाल ही में पद मुक्त हुए डीएसए के अध्यक्ष अनुज गुप्ता और उनके करीबी सही वक्त को तलाश रहे हैं
राजेंद्र सजवान
डीएसए (दिल्ली सॉकर एसोसिएशन) की असाधारण आम सभा द्वारा संशोधित संविधान स्वीकृत और अंगीकृत किए जाने के बाद यह घोषणा कर दी गई है कि देश की फुटबॉल को संचालित करने वाली एआईएफएफ के नियमानुसार 30 अगस्त को चुनाव होंगे। क्या बिना व्यवधान के ऐसा हो पाएगा? यह सवाल हर किसी को हैरान परेशान कर रहा हैं। इसलिए क्योंकि दिल्ली की फुटबॉल का चरित्र ही कुछ ऐसा वैसा…. रहा है। यह तब ही संभव हो पाएगा जबकि निर्धारित तिथि तक कोई बवाल खड़ा नहीं किया जाता।
आशंका इस बात की हैं कि जो सदस्य (क्लब) या उनके प्रतिनिधि आम सभा में उपस्थित नहीं हो पाए उनकी नीयत में खोट ना हो। डर इस बात का है कि बहुत कम सदस्यों का एक छोटा धड़ा बड़ा बवाल खड़ा ना कर दे। लेकिन बी.एस. मेहरा, सुशांत देव और लियाक़त अली की टीम की तैयारियां पूरी हैं, जिसके लिए हेमचंद, धर्मवीर और नागेंद्र सिंह जैसे अनुभवी और 70 पार के अधिकारियों को चुनाव का जिम्मा सौपा गया हैं। वरिष्ठतम और अनुभवी और नामी क्लब गढ़वाल हीरोज के सम्मानित मगन सिंह पटवाल आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका में नज़र आ सकते हैं। फिलहाल दूसरा धड़ा खामोश हैं या यूं भी कह सकते हैं कि किसी बड़े तूफान से पहले की ख़ामोशी हो सकती हैं।

उड़ती ख़बरों और अफवाहों पर गौर करें तो पूर्व अध्यक्ष शाजी प्रभाकरण की वापसी हो सकती हैं। लेकिन हाल ही में पद मुक्त हुए अध्यक्ष अनुज गुप्ता और उनके करीबी सही वक्त को तलाश रहे हैं। लेकिन यह संवाददाता कुछ सदस्यों से बातचीत के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हैं कि दिल्ली कि फुटबॉल में अपना कहे जाने वाले अधिकारी तो हो सकते हैं लेकिन खिलाड़ी दस फीसदी भी नहीं हैं। खिलाड़ियों के नाम पर मणिपुर, मेघालय, बंगाल, यूपी, उत्तराखंड, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, आदि प्रदेशों के खिलाड़ी दिल्ली के क्लबों में खेल रहे हैं। फुटबॉल कि आड़ में सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग का खेल भी जमकर खेला जा रहा हैं, जिस पर अंकुश लगाने में डीएसए अब तक नाकाम रहा हैं। एक साक्षात्कार में बीएस मेहरा और वरिष्ठ पदाधिकारियों ने फुटबॉल को बदनाम करने वाले क्लबों और अधिकारियों को आड़े हाथों लेने का आश्वासन दिया।
दूसरी बड़ी समस्या विभिन्न आयु वर्गों की टीमों के चयन में धांधली हैं। कुछ सदस्यों के अनुसार दिल्ली की फुटबॉल को एक ऐसा गैंग चलाता आया हैं, जिसके पास खिलाड़ियों के चयन के अधिकार सुरक्षित हैं। छोटे आयु वर्ग की टीमें हों या महिला पुरुषों की सीनियर टीम ऊंची पहुंच वाले खिलाड़ियों को पिछले दरबाजे से चुन लिया जाता हैं। कुछ एक ऐसे भी चुन लिए जाते हैं जो कि कभी खेले ही नहीं। यही हाल महिला टीमों का भी हैं।

बेशक, राष्ट्रीय मुकाबलों में दिल्ली की टीमों का प्रदर्शन शानदार रहा हैं लेकिन चयन में धांधली, विवादस्पद रेफरी, फिक्सिंग के आरोप सालों से लगते आ रहे हैं। किसी बड़े स्पोंसर का ना होना, डॉ बीआर अम्बेडकर स्टेडियम पर अधिकाधिक बोझ और अन्य मैदानों की अनुपलब्धता जैसी समस्याएं भी बड़ी चुनौती बन चुकी हैं। बाहरी खिलाड़ियों पर टिकी दिल्ली की फुटबॉल को हर कदम फूँक-फूँक कर रखना होगा। बेहतरी के लिए बदलाव होना चाहिए लेकिन सिर्फ गुट बदलने से फुटबॉल का भला नहीं होने वाला। हां, गुटबाजी तो शुरू हो चुकी हैं। लेकिन फुटबॉल का हित चाहने वालों की अनदेखी दिल्ली की फुटबॉल की पूरी हवा निकाल सकती हैं। देखते हैं घमासान होता है या फुटबॉल की जीत!
